विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर जिलाधिकारी नें साहित्य के पुरोधाओं को किया सम्मानित
साहित्य के ‘अमिय’ और ‘राम’ से मिले डीएम, बोले-मोबाइल की दुनिया से निकल किताबें पढ़ें छात्र
कहा-भावी पीढ़ी के लिए शब्द शैली में सुधार, लेखन और तनाव से मुक्ति पाने के लिए हिंदी साहित्य से अच्छा कोई विकल्प नहीं
कानपुर नगर विश्व हिंदी दिवस के अवसर पर जिलाधिकारी जितेन्द्र प्रताप सिंह ने शनिवार को नई पहल की। वह स्वयं चलकर सुप्रसिद्ध साहित्यकारों के द्वार पहुंचे। उन्होंने देश के प्रतिष्ठित व उप्र हिंदी संस्थान से साहित्य भूषण समेत दो सम्मान पा चुके साहित्यकार डा. ओम प्रकाश शुक्ल अमिय व वीर रस की धारा के विलक्षण कवि व 22 पुस्तकें लिख चुके डा. राम नरेश चौहान से मुलाकात की। साहित्यकार अमिय के केशव नगर स्थित घर पर हुई भेंट में उन्होंने कहा कि मोबाइल की दुनिया से बाहर निकलकर छात्र-छात्राएं किताबें और अखबार पढ़ें। इससे भावी पीढ़ी शब्द शैली में सुधार करने, लेखन व तनाव से मुक्ति पाने के साथ समाज को एकसूत्र में बांधने में आगे बढ़ सकेगी। हिंदी साहित्य ही सीखने का बेहतर विकल्प है। उन्होंने कहा कि वह स्वयं इस दिशा में काम करना चाहते हैं। साहित्यकार समाज की बड़ी पूंजी हैं। इन्हें संजोकर और इनके लेखन से सीखकर दिशा देने का काम करना है। साहित्य समाज का आईना है। समाज को अज्ञानता के अंधेरे से ज्ञान के उजाले की ओर ले जाता है। साहित्यकारों ने देश में ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी साहित्य का परचम लहराया है।
डा. ओम प्रकाश शुक्ल ‘अमिय’ के केशव नगर स्थित “कविताई भवन” निवास पर जिलाधिकारी ने उन्हें शुभकामनाएं दीं। कहा कि यह साहित्यिक आदान-प्रदान अत्यंत अच्छे व उल्लास पूर्ण वातावरण को आगे बढ़ाएगा। इसके पीछे उद्देश्य साहित्यकारों की प्रतिष्ठा व उनके सम्मान को सबके सामने लाना है। डा. ओमप्रकाश ने आधा दर्जन से अधिक देशों में अपनी रचनाएं प्रस्तुत कर हिंदी को सार्वभौमिक करने में अपना महती योगदान प्रदान किया है। नेपाल, मारीशस, इंडोनेशिया, थाईलैंड, कंबोडिया तक हिंदी का परचम फहराया है। अमिय मूलरूप से अवधी हास्य व्यंग के रचनाकार हैं, लेकिन लगभग हर विधा में उनकी रचनाएं प्रकाशित हुईं। ब्रज भाषा में प्रकाशित रचना उद्धव चुपाए रहौ बहुत अधिक साहित्यिक रूप से पसंद की गई। इसके साथ ही बड़ा मजा आई हास्य व्यंग्य रचना भी लोगों की जुबान पर चढ़ी है। मारीशस संस्मरण की पुस्तक ‘हमहू मारीशस पहुंचे जाए’, ‘कैसे-कैसे रूप रंग की सवारी जिंदगी’ पुस्तकें प्रकाशित हैं। जल्द उनकी महाकुंभ पर एक पुस्तक प्रकाशित होने वाली है।
वहीं, वरिष्ठ साहित्यकार व ओज के कवि कानपुर देहात के गजनेर के भिल्सी गांव में जन्मे डा. राम नरेश चौहान के विकट संघर्षों व घोर अभावों के बीच साहित्य की बेल को बढ़ाने का मर्म जाना।वह अब तक देश की लगभग 30 प्रतिष्ठित साहित्यिक व सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से सम्मानित हो चुके हैं। चाचा नेहरू इंटर कालेज में 35 साल प्रवक्ता भी रहे। उनकी 22 पुस्तकों में तुम्हें प्रणाम, राम बावनी, विजय पर्व, महारानी लक्ष्मीबाई, गीता अमृतम, अग्निपथ, सिंह नाद, पलाश के पुष्प, अपराजिता, झांसी की रानी महाकाव्य को खूब सराहना मिली। उनके लेखन व साहित्यिक जीवन को जाना। इस अवसर पर ज्ञानेंद्र मिश्र, कानपुर विभाग के बौद्धिक शिक्षण प्रमुख किंजल्क कुमार त्रिवेदी, उत्कर्ष मिश्रा, प्रत्यूष शुक्ला, एलआइसी के क्षेत्रीय राजभाषा अधिकारी सुधीर शुक्ल, डा. दिवाकर मिश्र, लक्ष्मी नारायण मिश्रा उपस्थित रहे। साहित्यकारों ने अपनी रचनाएं भी जिलाधिकारी को सुनाईं।

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