आत्मरक्षा और अनुशासन का अनोखा संगम – जीत कुने डो
मार्शल आर्ट और दर्शन का आधुनिक खेल
कानपुर नगर उपदेश टाइम्स
जीत कुने डो सिर्फ़ एक खेल नहीं, बल्कि आत्मरक्षा, अनुशासन और शारीरिक विकास का अनोखा माध्यम है। खेल विशेषज्ञ सुनील कुमार ने बताया कि यह खेल मुक्केबाजी, तलबवारबाजी, कुश्ती और विंग-चुन जैसी कई मार्शल आर्ट तकनीकों का संगम है। मुक्केबाज़ी के पंच और तलवारबाजी के फुटवर्क जैसी कलाओं के मेल से यह खेल युवाओं में तेज़ी से लोकप्रिय हो रहा है। जीत कुने डो की नींव विश्वप्रसिद्ध मार्शल आर्टिस्ट ब्रूस ली ने रखी थी। उन्होंने अपनी पुस्तक द ताओ ऑफ जीत कुने डो में इस खेल के दर्शन और दृष्टिकोण को विस्तार से समझाया। यह खेल शारीरिक क्षमता के साथ-साथ आत्म-खोज और व्यक्तित्व विकास पर भी ज़ोर देता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जीत कुने डो आत्मरक्षा के लिए बेहद प्रभावी है, क्योंकि इसकी तकनीक परिस्थितियों के अनुसार तुरंत ढलने की क्षमता प्रदान करती है। यह कठिन शैली नहीं, बल्कि व्यावहारिक और लचीली तकनीक पर आधारित है।
आज भारत के कई राज्यों में जीत कुने डो खेला जा रहा है। राज्य स्तर से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक प्रतियोगिताओं का आयोजन हो रहा है। इसके बढ़ते प्रभाव और लोकप्रियता को देखते हुए खेलो इंडिया प्रतियोगिता में भी इस खेल को शामिल किया गया है।

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