किसानों की खुशी में ही राष्ट्र की खुशी है-चौधरी चरण सिंह
चौधरी चरण सिंह (1902‑1987) भारतीय राजनीति के उन गिने‑चुने नेताओं में से एक हैं, जिनकी पहचान हमेशा “किसानों के मसीहा” के रूप में रही है। उनका जीवन संघर्ष, सामाजिक जागरूकता और कृषि‑नीति में गहरी समझ का समुच्चय है। भारत में उनके योगदान अविस्मरणीय है।
चौधरी चरण सिंह का जन्म 23 दिसंबर 1902 को उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले के नूरपुर गांव में हुआ। उनका परिवार एक साधारण जाट किसान परिवार था। पिता, चौधरी मुख्तार सिंह, एक छोटे‑से‑जमींदार थे और उन्होंने अपने बेटे को शिक्षा के महत्व को समझाया। बचपन से ही चरण सिंह को खेत‑खलिहान की वास्तविक समस्याओं का सामना करना पड़ा, जिससे उनकी सोच में किसान‑केन्द्रित दृष्टिकोण विकसित हुआ।
प्राथमिक शिक्षा नूरपुर में ही पूरी करने के बाद, चरण सिंह ने हापुड़ के सरकारी स्कूल से माध्यमिक शिक्षा प्राप्त की। उन्होंने इंटरमीडिएट की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पूरी की और फिर लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स से अर्थशास्त्र में स्नातक किया। न्होंने कृषि अर्थशास्त्र और ग्रामीण विकास के सिद्धांतों को गहराई से अध्ययन किया, जो बाद में उनकी नीति‑निर्धारण में प्रमुख भूमिका निभाए।
1920 के दशक में भारत में असहयोग आंदोलन का दौर था। चरण सिंह ने महात्मा गांधी के अहिंसात्मक आंदोलन में सक्रिय भागीदारी की। 1930 में उन्होंने नमक सत्याग्रह में भाग लिया और कई बार जेल गए। उनका मानना था कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक सत्ता की हस्तांतरण नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक स्वाधीनता का भी नाम है। इस कारण उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों को संगठित करने का काम शुरू किया।
1937 में चरण सिंह ने “किसान सभा” की स्थापना की, जिसका उद्देश्य किसानों को संगठित कर उनकी आर्थिक स्थिति सुधारना था। उन्होंने जमींदारी प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई और “भूमि‑से‑भूख” की नीति को चुनौती दी। इस दौरान उन्होंने कई बार किसानों के हित में आंदोलन किए, जिनमें “बंदोबस्ती आंदोलन” और “किसान मोर्चा” प्रमुख हैं।
1940 के दशक में चरण सिंह कांग्रेस पार्टी में शामिल हुए। उन्होंने 1946 के प्रांतीय चुनावों में भाग लिया और उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद, उन्होंने विभिन्न मंत्रालयों में कार्य किया, जिसमें कृषि, पशुपालन और ग्रामीण विकास मंत्रालय शामिल थे।
1967 में चरण सिंह को भारत के कृषि मंत्री के रूप में नियुक्त किया गया। इस अवधि में उन्होंने “हरित क्रांति” के प्रारंभिक चरण को तेज किया। उन्होंने उच्च उपज वाले बीज, उन्नत सिंचाई तकनीक और रियायती उर्वरक वितरण को बढ़ावा दिया। उनका मानना था कि कृषि का आधुनिकीकरण ही ग्रामीण गरीबी को मिटाने का एकमात्र रास्ता है।
1979 में जनता पार्टी की सरकार में चरण सिंह ने प्रधानमंत्री का पद संभाला। उनका कार्यकाल केवल सात महीने तक चला, परन्तु इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण निर्णय लिये। उन्होंने “किसान ऋण माफी योजना” शुरू की, जिससे छोटे और सीमांत किसानों को राहत मिली। साथ ही उन्होंने “अनाज भंडारण नीति” को सुदृढ़ किया, जिससे अन्न की बर्बादी कम हुई।
चरण सिंह ने हमेशा जमींदारी प्रथा को समाप्त कर भूमि का पुनर्वितरण करने की बात कही। उन्होंने “भू‑सुधार” को अपनी प्राथमिकता बनाया और इस दिशा में कई विधेयक पारित करवाए। उनका मानना था कि जब तक ज़मींदारों के पास बड़ी ज़मीनी संपत्ति होगी, तब तक किसान स्वतंत्र नहीं हो पाएगा।
सहकारी संस्थाओं को बढ़ावा देना चरण सिंह की प्रमुख नीति थी। उन्होंने “किसान सहकारी बैंक” और “सहकारी कृषि समितियों” की स्थापना में मदद की। इन संस्थानों ने किसानों को कम ब्याज पर ऋण, बीज, उर्वरक और तकनीकी सहायता प्रदान की।
उन्होंने “जल संरक्षण” को राष्ट्रीय एजेंडा बनाया। उन्होंने “ड्रिलिंग टैंक” और “छोटे जलाशयों” के निर्माण को प्रोत्साहित किया, जिससे सूखे‑प्रवण क्षेत्रों में जल उपलब्धता बढ़ी।
चरण सिंह ने महिलाओं की शिक्षा और सामाजिक स्थिति में सुधार के लिए भी काम किया। उन्होंने ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों के लिए स्कूलों की स्थापना को प्रोत्साहित किया और “बालिका शिक्षा” को प्राथमिकता दी। साथ ही उन्होंने “अस्पृश्यता” के खिलाफ आवाज उठाई और दलित वर्ग के उत्थान के लिए कई योजनाएं बनाईं।
चरण सिंह को “सादगी का प्रतीक” कहा जाता है। वह हमेशा साधारण कपड़े पहनते थे और अपने घर में साधारण भोजन करते थे। उनका व्यवहार विनम्र, परन्तु दृढ़ था। वह अपने सिद्धांतों पर अटल रहे और कभी भी व्यक्तिगत लाभ के लिए समझौता नहीं किया। उनका भाषण सरल और प्रभावी होता था, जिससे वह ग्रामीण जनता के बीच आसानी से जुड़ पाते थे।
चौधरी चरण सिंह की नीतियों का प्रभाव आज भी भारतीय कृषि में देखा जा सकता है। “हरित क्रांति” के बाद भारत ने अनाज उत्पादन में आत्मनिर्भरता हासिल की, जिसमें उनकी भूमिका को अक्सर अनदेखा किया जाता है। उनके द्वारा स्थापित सहकारी मॉडल आज भी कई राज्यों में सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है।
किसानों के हित में उनका “कर्ज माफी” और “भू‑सुधार” आज भी चर्चा का विषय हैं। उनके जन्मदिन, 23 दिसंबर, को “किसान दिवस” के रूप में मनाया जाता है, जिससे उनकी किसान‑हितैषी विचारधारा को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जा रहा है।
चौधरी चरण सिंह सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि एक सामाजिक सुधारक, कृषि विशेषज्ञ और ग्रामीण विकास के प्रणेता थे। उनका जीवन संघर्ष, सिद्धांत और कार्य आज भी भारतीय लोकतंत्र में एक प्रेरणा स्रोत हैं। उन्होंने यह सिद्ध किया कि राजनीति का मूल उद्देश्य जनता की सेवा होना चाहिए, विशेषकर उन किसानों की, जो देश की रीढ़ हैं। उनका आदर्श “किसानों की खुशी में ही राष्ट्र की खुशी है” आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था।
डॉ नन्दकिशोर साह

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