नशे की गिरफ्त में दुनिया,नए भारत के सामने सामाजिक और नैतिक चुनौती
महान साहित्यकार प्रेमचंद ने कहा था— “युवक वही है जो अपनी ऊर्जा समाज के निर्माण में लगाए, विनाश में नहीं।” यह कथन आज के भारत और विश्व की वर्तमान स्थिति पर बिल्कुल सटीक बैठता है। इक्कीसवीं सदी का भारत एक ओर आर्थिक प्रगति, तकनीकी नवाचार और वैश्विक मंच पर नेतृत्व की ओर अग्रसर है, तो दूसरी ओर नशे की बढ़ती हुई प्रवृत्ति एक ऐसी सामाजिक महामारी के रूप में उभर रही है, जो हमारी युवा चेतना, नैतिक मूल्यों और राष्ट्रीय भविष्य को भीतर से खोखला कर रही है। यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी दुनिया सूखे नशे और सिंथेटिक ड्रग्स की गिरफ्त में है, जहाँ विकास के साथ विनाश का यह छद्म चेहरा भी तेजी से फैल रहा है।
महात्मा गांधी ने नशे को केवल व्यक्तिगत बुराई नहीं, बल्कि सामाजिक पतन का मूल कारण माना था। उन्होंने स्पष्ट कहा था— “नशा मनुष्य की विवेक शक्ति को हर लेता है और विवेकहीन समाज स्वतंत्र नहीं रह सकता।” गांधीजी के लिए स्वराज केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्मसंयम और नैतिक अनुशासन पर आधारित था। आज जब नशा व्यक्ति की चेतना और निर्णय क्षमता को नष्ट कर रहा है, तब यह स्वराज की आत्मा पर सीधा आघात है। इसी तरह स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा था— “ताकत शरीर में नहीं, चरित्र में होती है। जो अपनी इंद्रियों का दास है, वह राष्ट्र का निर्माता नहीं बन सकता।” नशा इंद्रियों को नहीं, बल्कि इंद्रियों के माध्यम से पूरे व्यक्तित्व को दास बना लेता है, और यही कारण है कि नशे में डूबा युवा अपने ही भविष्य का शत्रु बन जाता है।
वैश्विक संदर्भ में देखें तो संयुक्त राष्ट्र मादक पदार्थ एवं अपराध कार्यालय की रिपोर्टें यह संकेत देती हैं कि दुनिया में ड्रग्स का अवैध कारोबार हथियारों की तस्करी के बाद सबसे बड़ा संगठित अपराध बन चुका है। अरबों डॉलर का यह काला धन आतंकवाद, मानव तस्करी और हिंसक अपराधों को पोषित कर रहा है। भारत की भौगोलिक स्थिति—‘गोल्डन क्रीसेंट’ और ‘गोल्डन ट्रायंगल’ के बीच—इसे इस वैश्विक जाल के प्रति और अधिक संवेदनशील बना देती है। नए भारत की समुद्री सीमाएँ, डिजिटल अर्थव्यवस्था और खुला वैश्विक संपर्क जहाँ विकास के प्रतीक हैं, वहीं नशा तस्करों के लिए नए रास्ते भी बनते जा रहे हैं। भगवान बुद्ध ने सदियों पहले चेतावनी दी थी— “मद्यपान प्रमाद को जन्म देता है और प्रमाद से दुख।” यह कथन आज भी उतना ही सत्य है, क्योंकि नशा व्यक्ति को प्रमाद की अवस्था में ले जाकर अपराध, हिंसा और आत्मविनाश की ओर धकेल देता है।
नशे का सबसे भयावह पहलू यह है कि यह मनुष्य की संवेदना, करुणा और नैतिकता को धीरे-धीरे समाप्त कर देता है। एक बार मस्तिष्क की कार्यप्रणाली प्रभावित होने पर व्यक्ति अपराध करने में संकोच नहीं करता। यही कारण है कि नशे से जुड़े बलात्कार, हत्या, लूट और सड़क दुर्घटनाएँ समाज के लिए स्थायी भय का कारण बनती जा रही हैं। आचार्य विनोबा भावे ने कहा था— “जिस समाज में संयम नहीं, वहाँ शांति नहीं।” नशा संयम का सबसे बड़ा शत्रु है और इसलिए सामाजिक अशांति को जन्म देता है। सोशल मीडिया और डार्क वेब के माध्यम से ड्रग्स की आसान उपलब्धता ने किशोरों और युवाओं को इस लत के और निकट पहुँचा दिया है, जहाँ ‘फैशन’ और ‘स्टेटस’ के नाम पर विनाश को स्वीकार किया जा रहा है।
फिल्म, ग्लैमर और पार्टी संस्कृति ने अनजाने में नशे को सामान्य और आकर्षक बनाकर प्रस्तुत किया है। रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा था— “जहाँ मन भय से मुक्त हो और विवेक जाग्रत हो, वही सच्ची स्वतंत्रता है।” परंतु नशा भय और भ्रम दोनों को जन्म देता है, जिससे न तो मन मुक्त रहता है और न विवेक जाग्रत। ग्रामीण और अर्धशहरी भारत में सस्ती शराब और नशीली दवाओं का दुरुपयोग गरीबी, घरेलू हिंसा और पारिवारिक विघटन को बढ़ा रहा है, जिससे सामाजिक असमानता और पीढ़ीगत पतन गहराता जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा यह कहना कि “नशा समाज का नहीं, संकल्प का शत्रु है” इस संघर्ष की दिशा स्पष्ट करता है। यह लड़ाई केवल कानून और पुलिस की नहीं, बल्कि जनचेतना और नैतिक पुनर्जागरण की है। आवश्यकता है एक समन्वित राष्ट्रीय नीति की, जो वैश्विक सहयोग, सख्त प्रवर्तन, डिजिटल निगरानी, प्रभावी पुनर्वास और व्यापक जनजागरूकता को एक साथ आगे बढ़ाए। स्कूलों में जीवन-कौशल शिक्षा, युवाओं के लिए खेल और रचनात्मक अवसर, मीडिया में जिम्मेदार प्रस्तुति और परिवारों में संवाद—ये सभी मिलकर ही इस सामाजिक महामारी को रोक सकते हैं।
अंततः यह प्रश्न केवल स्वास्थ्य या अपराध का नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा और भविष्य का है। यदि भारत को सशक्त और वैश्विक नेतृत्वकर्ता बनना है, तो उसे अपनी युवा शक्ति को नशे के अंधकार से निकालकर सृजन, अनुशासन और मानवता के प्रकाश की ओर ले जाना होगा। जैसा कि महात्मा गांधी ने कहा था— “भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि हम आज क्या करते हैं।” आज यदि हम नशे के विरुद्ध सामूहिक संकल्प लें, तो आने वाला भारत स्वस्थ, नैतिक और सुरक्षित होगा। नशा केवल शरीर को नहीं, बल्कि विवेक, मूल्य और भविष्य—तीनों को नष्ट करता है; इसलिए अब समय है कि राष्ट्र एक स्वर में कहे— ड्रग्स मुक्त भारत ही सुरक्षित, सशक्त और विकसित भारत है।
संजीव ठाकुर

वेटरन्स डे
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