गनर्स डे
(28 सितंबर)
“गनर” शब्द गन से बना हुआ है | आम बोलचाल की भाषा में गन (बंदूक) के साथ किसी की सुरक्षा में तैनात सिपाही को गनर कहते हैं , लेकिन सेना के सन्दर्भ में गन का अर्थ `तोप’ से है | सेना में जो सैनिक तोप पर काम करते, तोप को चलाते हैं उनको गनर या तोपची कहा जाता है | गनर नाम का पद सेना की तोपखाना रेजिमेंट, सेना वायु रक्षा रेजिमेंट तथा बख्तरबंद रेजिमेंट में सृजित है | वैसे तो तोपों का प्रयोग भारतीय नौसेना के युद्ध पोतों और वायु सेना के लड़ाकू विमानों में भी किया जाता है लेकिन वायु सेना में इनको पायलट तथा नौसेना में निर्धारित व्यक्ति ही फायर करता है | सेना द्वारा प्रयोग में लायी जाने वाली तोपें वजन में भारी और लम्बी दूरी तक मार करने वाली होती हैं , जबकि नौसेना और वायु सेना में प्रयोग की जाने वाली तोपें हलके वजन की और कम दूरी की मार करने वाली होती हैं |
हमारे देश में तोपखाने के प्रयोग का श्रेय मुग़ल सम्राट बाबर को दिया जाता है | उन्होंने तोपखाने का प्रयोग सन 1526 में पानीपत की लड़ाई में दिल्ली सल्तनत के शासक इब्राहिम लोदी की सेना को हराने के लिए किया था | कहीं कहीं पर सन 1368 में अदोनी की लड़ाई में बहमनी राजाओं और पंद्रहवीं शताब्दी में गुजरात के राजा मोहम्मद शाह द्वारा तोपों के इस्तेमाल के बारे में जानकारी मिलती है |
आज जिस रूप में भारतीय सेना की तोपखाना रेजिमेंट है उसकी नींव 28 सितंबर 1827 को यानी कि आज से 200 वर्ष पूर्व रखी गई थी | भारतीय तोपखाने की शुरुआत 2.5 इंच की तोपों से हुई थी और आज इस रेजिमेंट के पास दुनिया की सबसे बेहतर शस्त्र प्रणाली है | रेजिमेंट के स्थापना दिवस को ही सेना की यह शाखा गनर्स डे (Gunners Day) के नाम से मनाती है|
रॉयल इंडियन आर्टिलरी का गठन 28 सितंबर 1827 को बॉम्बे प्रेसीडेंसी की एक प्रेसीडेंसी सेना , बॉम्बे आर्मी के एक भाग के रूप में किया गया था । बाद में इसका नाम बदलकर 5 बॉम्बे माउंटेन बैटरी कर दिया गया। सन 1857 का विद्रोह 10 मई 1857 को मेरठ में शुरू हुआ। इस विद्रोह में बंगाल आर्टिलरी के कई भारतीय सैनिक शामिल थे | इसलिए उस समय मौजूद पैदल तोपखाने की तीनों बटालियनों को 1862 में भंग कर दिया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय गनरों ने 01 विक्टोरिया क्रॉस , 01 जॉर्ज मेडल , 15 मिलिट्री क्रॉस , 02 आईओएम , 22 आईडीएसएम , 18 मिलिट्री मेडल , 05 ओबीई , 01 एमबीई , 03 बीईएम , 13 बर्मा वीरता पदक और 467 जंगी इनाम जीते । द्वितीय विश्व युद्ध में गनरों के योगदान को देखते हुए, भारतीय तोपखाने को 1945 में प्रतिष्ठित ‘रॉयल’ उपाधि दी गई। उस समय इसे ‘इंडियन रेजिमेंट ऑफ आर्टिलरी’ कहा जाता था, लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध की सफलता को देखते हुए 01 नवंबर 1940 को इसका नाम बदलकर ‘द रेजिमेंट ऑफ इंडियन आर्टिलरी’ और अक्टूबर 1945 में ‘ रॉयल रेजिमेंट ऑफ इंडियन आर्टिलरी ‘ कर दिया गया । 26 जनवरी 1950 को देश में अपना संविधान लागू होने पर इसके नाम के आगे से ‘रॉयल’ शब्द हटा दिया गया।
स्वतंत्रता के समय, भारतीय तोपखाने में फील्ड, मीडियम, वायु रक्षा, आर एंड ओ जैसी कई शाखाएं थीं। 1947 में देश के विभाजन के समय रॉयल इंडियन आर्टिलरी को विभाजित किया गया, जिसमें भारत को साढ़े अठारह रेजिमेंट और पाकिस्तान को नौ साढ़े यूनिटें मिलीं । तोपखाना रेजिमेंट्स ने 1947-1948 के भारत-पाकिस्तान युद्ध , 1962 के भारत-चीन युद्ध , 196 5 के भारत-पाकिस्तान युद्ध , 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और आपरेशन विजय में भाग लिया और अपने आदर्श वाक्य “सर्वत्र इज्जत – ओ – इकबाल” के अनुरूप शानदार प्रदर्शन किया । समय की मांग के हिसाब से भारतीय तोपखाने का समय समय पर पुनर्गठन होता रहा। 1964 में तटीय तोपखाने को भारतीय नौसेना को सौंप दिया गया। आर एंड ओ फ्लाइट और सेना वायु रक्षा कोर क्रमशः 1986 और 1994 में भारतीय तोपखाने से अलग होकर भारतीय सेना की नई शाखाएँ बनीं ।
यदि हम बात गनर की करें तो सेना की तीनों शाखाओं में सभी लोग चाहे वह अधिकारी हों, जूनियर कमीशन अधिकारी हों या जवान, सभी गनर होते हैं | क्योंकि तोप पर किया जाने वाला काम समन्वय, एकजुटता और तालमेल का है | एक दूसरे के सहयोग के बिना तोप से फायर करना असंभव है | सेना में गनर ट्रेड को सबसे मेहनती, संघर्षशील और सहनशील माना जाता है | गन से गोले को फायर कर उसके नियत स्थान पर पहुँचाने में एक गनर की बहुत ही महत्वपूर्ण भूमिका होती है , जिसका श्रेय उसको मिलना ही चाहिए | यही वह व्यक्ति या व्यक्तियों का समूह होता है जो अंजाम या परिणाम को हासिल करता है |
आपको बताते चलें कि भारतीय तोपखाना हमारी सेना की दूसरी सबसे बड़ी लड़ाकू शाखा है, जो भारतीय सेना के सभी कोर के सैनिकों को जमीनी अभियानों के दौरान भारी गोलाबारी प्रदान कर दुश्मन को पीछे हटने और अपनी सेना को आगे बढ़ने का मौका देती है , इसलिए इसको “युद्ध का भगवान” कहा जाता है | यह अपनी मारक क्षमता के साथ सेना की कुल ताकत का लगभग एक-छठा हिस्सा है। भारतीय तोपखाना रेजिमेंट ने अब तक लड़ें गये युद्धों और यौद्धिक संक्रियाओं में 01 विक्टोरिया क्रॉस , 01अशोक चक्र , 07 महावीर चक्र, 08 कीर्ति चक्र, 92 वीर चक्र , 03 युद्ध सेवा पदक, 56 शौर्य चक्र और 441 सेना पदक (वीरता) प्राप्त किया है।
(इन पंक्तियों का लेखक भी सेना वायु रक्षा कोर का गनर ट्रेड का जूनियर कमीशन अफसर है |)
– हरी राम यादव
सूबेदार मेजर (ऑनरेरी)

आत्मनिर्भरता से विकसित भारत की ओर आजादी की उड़ान -ललित गर्ग-
राजकीय संग्रहालय विदिशा में अम्बिका की दो प्राचीन प्रतिमाएं -डॉ. महेन्द्रकुमार जैन ‘मनुज’, इन्दौर
मंदिरों में भ्रष्टाचारः वहां सुशासन की नई क्रांति का सूत्रपात हो -ः ललित गर्ग:-
“छात्रों के भविष्य और लद्दाख के अस्तित्व से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं: सरकार हठधर्मिता छोड़े” — भवन नाथ पासवान
विकास की धंसती सड़कें और भ्रष्टाचार की गहरी नींवें -ः ललित गर्ग:-
सूबेदार मेजर (आनरेरी कैप्टन) योगेन्द्र सिंह यादव, परमवीर चक्र 