चौरीचौरा आन्दोलन के नायक अमर शहीद छोटू पासी
बीर महाराजा लाखन पासी द्वारा बसाये गये शहर लखनऊ से 275 कि0मी0 दूर उ0प्र0 के गोरखपुर जिले के चौरीचौरा में 5 फरवरी 1922 को चौरीचौरा कोतवाली दहन आन्दोलन उस समय हुआ था, जब अंग्रेजी हुकूमत का एक अदना सा चौकीदार गाँव में प्रवेश करता था तो मारे डर के पूरा गांव खाली हो जाता था। 5 फरवरी सन् 1922 को रविवार का दिन था। इस दिन चौरीचौरा के मुंडेरा बाजार में साप्ताहिक हाट लगनी थी। रोजमर्रा की चीजों की दुकानें व फड़ सजने थे। मुंडेरा बाजार में मुख्य रूप से लौह के औजार और चमड़े व मांस का बाजार होता था, पर आज हाट नहीं सजी थी। कारण, चार दिन पहले 1 फरवरी 1922 को चौरीचौरा थाना के दरोगा गुप्तेश्वर सिह ने क्रान्तिकारी भगवान अहीर से गाली गलौच की और उन्हें लाठियों से पीटा था। जिससे उनकी हालत मरणासन्न सी हो गयी थी। चौरीचौरा में अहीरों की आबादी न के बराबर थी, इसलिए पुलिसिया ज्यादती के विरोध का जिम्मा दलितों ने अपने सिर उठा लिया था। तय समय पर हजारों दलितों ने थानाध्यक्ष गुप्तेशवर सिंह के विरूद्ध कार्यवाही करने हेतु ज्ञापन देने और विरोध प्रदर्शन करने व मुंडेरा बाजार को बन्द करने के लिए इकट्ठा होने लगे। इस विरोध प्रदर्शन में जिन लोगों ने भाग लिया, वे सब दलित व पिछड़े वर्ग के थे। कंधे से कंधा मिलाकर छोटू पासी, सम्पत, रमापति, रामसरन, अलगू पासी ,कल्लू, गरीब, जगेशर, नोहर, फलई, बिरजा, मेड़ई, रघुनाथ, रामजस, मंडी व भग्गो सब के सब हजारों दलितों की भीड़ के साथ गुप्तेश्वर सिंह मुर्दाबाद, सामंतवाद मुर्दाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद, इन्कलाब जिन्दाबाद, हमारा शोषण बन्द करो, अंग्रेजो भारत छोड़ो व जय भारत के नारे लगा रहे थे।
थाने की ओर बढ़ती भीड़ को रोकने के लिए पुलिस वालों ने दलितों को जाति सूचक गाली दी। जाति सूचक गालियों की आवाज कान में पड़ते ही भीड़ उग्र हो उठी। पुलिस ने भीड़ को तितर बितर करने के लिए हवा में गोलियां चलायीं। देखते ही देखते भीड़ ने चौरीचौरा थाने में आग लगा दी, जिससे 23 पुलिस व कर्मचारी या तो जिन्दा जलकर मर गये या उनकी हत्या कर दी गयी। यह चौरीचौरा कोतवाली दहन आन्दोलन अंग्रेजी हुकूमत के विरूद्ध दलित वर्ग की ओर से विद्रोह की खुली चेतावनी थी। छोटू पासी ने सभी का आवाहन करते हुये कहा कि हमें मरते दम तक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करना ही हैं लेकिन पहले अंग्रेजों के पिट्ठु सामंतों को ठीक करना होगा जो लोग अंग्रेजी सरकार में नौकर बनकर हमारे लोगों पर ज़ुल्म अत्याचार करते हैं ।
उस समय गांधी जी देशव्यापी आन्दोलन चला रहे थे। गांधी जी ने अपना आन्दोलन तुरन्त वापस ले लिया। इसलिए, क्योंकि देश की स्वतंत्रता के लिए हुये आन्दोलन का दलित वर्ग भी नेतृत्व करने लगा था। उन्हें भय था, कि यदि स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्व दलित जातियों के हाथ में चला गया तो भारतीय संस्कृति के प्राण वर्णव्यवस्था का क्या होगा? आन्दोलन के वापस लेने पर देश के शीर्ष नेताओं ने गांधी की आलोचना भी की। गांधी के आन्दोलन के वापस लेने से एक विवाद सा उठ खड़ा हुआ था। गांधी के इस निर्णय पर मोतीलाल नेहरू, चितरंजनदास, सुभाषचन्द्र बोस आदि नेता भौचक्के रह गये थे। सम्भवतः गांधी को यह महसूस होने लगा था कि पेशवाओं के शासन ने जिन जातियों को अपराधी घोषित किया था, वे जातियां देश के स्वतंत्रता आन्दोलन का नेतृत्व करने जा रही थीं। शोषण के विरूद्ध दलित जातियां राजनैतिक मंच पर एकत्रित हो रही थी।
भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन में चौरीचौरा कोतवाली दहन आन्दोलन की घटना एक बहुत बड़ी क्रान्ति थी। यह क्रान्ति जन साधारण दलितों व पिछड़ों द्वारा की गई थी। छोटू पासी, रमापति अलगू पासी और उसके साथियों ने ब्रिटिश शासकों की नींव हिला दी थी। इस कांड में सैकड़ों लोगों को पकड़ा गया जो विरोध प्रदर्शन कर फरार हो गये थे। भग्गो जैसे तमाम क्रान्तिकारियों के विरूद्ध फरारी वारन्ट काटे गये। 272 लोगों के चालान कटे। 228 लोगों को सेशन सुपुर्द किया गया, जिन पर जेल में मुकदमा चला। निचली अदालत ने 172 लोगों को फांसी की सजा दी। फैसले के विरूद्ध अपील की गयी जिस पर फैसला आया कि 19 लोगों को छोटू पासी, रमापति चमार, अलगू पासी सहित फांसी की सजा हुई तथा 14 लोगों को आजीवन कारावास दिया गया था। शेष लोगों को 8 साल, 5 साल, 3 साल एवं 2-2 साल की सजाएं दी गयी थी। न्यायालय का यह फैसला 30 अप्रैल 1923 को आया था। मगर फांसी का दिन 2 जुलाई 1923 मुकर्रर हुआ था।
इस बीच मई-जून दो माह के अन्तराल में छोटू पासी को जेल में भीषण यातनाएं दी गयी। किन्तु मार के ऊपर मार और जख्म के ऊपर जख्म खाने के बावजूद भी उसने चौरीचौरा कोतवाली दहन आन्दोलन के फरार साथियों के विषय में मुंह नहीं खोला। छोटू पासी ने सब कुछ जानते हुए भी मुंह नहीं खोला था कि फरार लोगों को उन्होंने ही नेपाल के रास्ते तड़ीपार होकर भाग जाने की सलाह दी थी। बाद में वह अपने सबसे प्रिय बचपन के साथी भग्गों को वह नेपाल में ही मिलने वाला था। किन्तु ऐन मौके पर वह पकड़ा गया। उसे यातनायें असहनीय हो गयी थी बाद मे उसे 2 जुलाई 1923 को फांसी दे दी गयी। छोटू पासी ने मरते दम तक अपना वादा निभाया और अपने फरार साथियों का पता नहीं बताया था। श्री राजकुमार इतिहासकार की पुस्तक ”पासी समाज का स्वतंत्रता संग्राम में योगदान“ के अनुसार श्री छोटू पासी का जन्म अवध प्रान्त के नगर गोरखपुर में थाना चौरीचौरा के क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत आने वाले गांव मे हुआ था। बाद में मामला शान्त होने पर घटना में सम्मिलित उसका सबसे प्रिय बचपन का साथी भग्गो नेपाल की पश्चिमी सीमा के रास्ते यूनाईटेड प्राविन्स के आगरा प्रान्त में प्रवेश कर गया। अपने सच्चे दोस्त छोटू पासी की शहादत को नमन करते हुए भग्गो चमार सन् 1978 के आगरा कांड का प्रेरणा स्रोत बना। यह उल्लेखनीय है कि चौरी चौरा में पासी समुदाय की जनसंख्या सर्वाधिक है। व चौरीचौरा कोतवाली दहन आन्दोलन मे भी पासियों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया था। चौरीचौरा कोतवाली दहन आन्दोलन में अधिकांश आन्दोलनकारी पासी समुदाय के थे।
राष्ट्रनायक बाबा साहब डॉ0 भीमराव अम्बेडकर के जीवन जीने के लिए व जीवित रहने की प्राणवायु प्राथमिक व सर्वाधिक महत्वपूर्ण आवश्यकता व सर्वाधिक उपयोगी अधिकार चेतना के लिये संघर्ष का घोतक पानी पीने के लिये चावदार आन्दोलन व मनुस्मृति दहन दलितों व वर्णवादियों को संदेश देने के लिये ईश्वर की निःसारता के प्रमाणन व दलित प्रवेश वर्जन की वास्तविकता के प्रदर्शन के बाबा साहब के कालाराम मन्दिर आन्दोलन की तरह 5 फरवरी 1922 को दलित नायकों के नेतृत्व में घटित चौरीचौरा कोतवाली दहन आन्दोलन को भी भारतीय इतिहास में स्मरण व नमन किया जाना चाहिए। अंग्रेजी शासन में चौरीचौरा का वर्णवादी तत्कालीन थानेदार गुप्तेश्वर सिंह अंग्रेजो का गुलाम था जो अंग्रेजों के दिशा निर्दशन में क्रान्तिकारियों को कुचल रहा था व दलितों को पीड़ित, प्रताड़ि़त व अनवरत गाली दे रहा था। जिससे दलित नायकों छोटू पासी व रमापति चमार वो अलगू पासी के नेतृत्व में स्थानीय लोगों का यह स्वतः स्फूर्त आन्दोलन था। अंग्रेजो व सामन्तों के विरूद्ध हुआ भारतीय इतिहास का एक सशक्त आन्दोलन था। किन्तु हम अपने इन महापुरूषों के ऐतिहाासिक योगदान को रेखांकित करने व इतिहास के पन्नों में देश के लिए इनके त्याग व संघर्ष को स्वर्णाक्षरों में अंकित न करा सके। यह उल्लेखनीय है कि 5 फरवरी 1922 को अंग्रेजो व सामन्तों के विरूद्ध व अंग्रेजी सत्ता को सबक सिखाने के दृष्टिकोण से छोटू पासी व रमापति चमार के नेतृत्व में घटित चौरी चौरा कोतवाली दहन आन्दोलन के समय कोतवाली का तत्कालीन दरोगा जो अंग्रेजो का गुलाम था व वर्णवादी मानसिकता व आभिजात्य उच्चतावोध की भावना से ग्रसित व अपनी स्वार्थलिप्सा में संलिप्त अंग्रेजो व उनके पिट्ठू सामन्तों के दिशा निर्देशन में दलित समाज व दलित क्रान्तिकारियों को कुचल रहा था व दलितों को अनवरत पीड़ित प्रताड़ित व अनवरत गाली दे रहा था और कह रहा था पासी चमार होश में आओ, अपनी औकात में आओ। अंग्रेज व सामन्त हमारे माईबाप हैं उनका विरोध मत करो, जिससे कोतवाली दहन आन्दोलन के दलित नायकों छोटू पासी व रमापति चमार के नेतृत्व में हुआ देश को अंग्रेजी गुलामी से मुक्त कराने की भावना से ओतप्रोत व देश के लिये समर्पित स्थानीय लोगों का यह स्वतः र्स्फूत अंग्रेजो व सामन्तों के विरूद्ध हुआ भारतीय इतिहास के स्वर्णिम पन्नों में अंकित होने योग्य सशक्त आन्दोलन था। जनता ने अंग्रेजी व सामन्ती दमन के विरूद्ध निर्णायक प्रतिकार किया। उनका बलिदान भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन को नई चेतना, नई ऊर्जा और नई दिशा देने वाला था। देश का देशवासी उनके त्याग को युगों युगों तक याद रखेगा। चौरी चौरा की घटना के समकालीन ही सक्रिय आन्दोलन किसान आन्दोलन व एका आन्दोलन के नायक मदारी पासी की लोकप्रियता से भी महात्मा गांधी भयभीत हुये थे, क्योंकि मदारी पासी को ”दूसरा गांधी“ के रूप में जनता स्वीकारती जा रही थी व उनके प्रति आकर्षित हो रही थी। जननायक मदारी पासी भी जाति प्रथा गैरबराबरी, असमानता, सामाजिक भेदभाव, अभाव, गरीबी, वर्णव्यवस्था व अंग्रेजी राज्य व सामन्तों द्वारा किये जा रहे दोहरे शोषण, क्रूर अंग्रेजी व सामन्ती व्यवस्था के विरूद्ध प्रभावी जन आन्दोलन खड़ा कर रहे थे व आजीवन अनवरत संघर्षरत थे।
चौरीचौरा कोतवाली दहन आन्दोलन में फूंक दिये जाने के बाद बिट्रिश सरकार ने सन् 1924 मे चौरीचौरा कोतवाली का पुर्ननिर्माण कराया। चौरीचौरा का नाम आते ही अमर शहीद छोटू पासी, अलगू पासी की शहादत सहज ही जेहन मे उतर आती है।
सदियों से तलवार व लाठी चलाने वाला पासी समाज कलम चलाना न सीख पाया और पिछड़ता ही गया। पासी समाज के वीरों, वीरांगनाओं, महान क्रान्तिकारियों, राजाओं, महाराजाओं, समाज सुधारकों, नेतृत्व प्रदाताओं को इतिहास में स्थान ही नहीं मिल पाया।
पासी जाति की गणना वीर बहादुर समाज के रक्षक, लाठी चलाने की कला मे निष्णात के रूप में होती ।
द्वारा लेख सी0बी0 भारती सर पूर्व निदेशक रोजगार सेवा योजना इलाहाबाद वाराणसी मण्डल की कलम से

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