बढ़ते अपराध और अपराधमुक्त समाज निर्माण की चुनौती -ः ललित गर्ग:-
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के ताजा आंकड़े केवल सांख्यिकीय दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि वे हमारे समाज के उस अंधेरे और भयावह चेहरे को सामने लाते हैं, जिसे अक्सर विकास, आधुनिकता और राजनीतिक उपलब्धियों की चमक में छिपा दिया जाता है। वर्ष 2024 के अपराध आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत आर्थिक, तकनीकी और वैश्विक स्तर पर चाहे जितनी प्रगति कर रहा हो, लेकिन सामाजिक और नैतिक स्तर पर अनेक गंभीर चुनौतियों से घिरा हुआ है। जब देश में हर 17 मिनट में हत्या, हर पांच मिनट में अपहरण, हर 18 मिनट में बलात्कार और लगभग हर दो मिनट में आर्थिक अपराध या धोखाधड़ी हो रही हो, तब यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह पूरे सामाजिक ढांचे, नैतिक मूल्यों और प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर प्रश्नचिह्न बनकर खड़ा हो जाता है। आज हम विकसित भारत, आत्मनिर्भर भारत और 2047 तक विश्वगुरु भारत का सपना देख रहे हैं। लेकिन यह सपना तभी साकार हो सकता है, जब समाज भयमुक्त, हिंसामुक्त और अपराधमुक्त बने। अपराधों से ग्रस्त समाज कभी स्वस्थ, संतुलित और आदर्श समाज नहीं बन सकता। यदि समाज का वातावरण असुरक्षा, भय, अविश्वास और हिंसा से भरा होगा, तो विकास की सारी योजनाएं खोखली सिद्ध होंगी। एनसीआरबी के आंकड़े हमें चेतावनी दे रहे हैं कि यदि समय रहते अपराधों की जड़ों को नहीं पहचाना गया और उन पर कठोर अंकुश नहीं लगाया गया, तो यह स्थिति भविष्य में और अधिक विस्फोटक हो सकती है।
विशेष चिंता का विषय महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध हैं। राजस्थान का लगातार छठे वर्ष महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में शीर्ष पर बने रहना अत्यंत चिंताजनक है। बलात्कार के मामले में यह पहले स्थान पर, जबरन गर्भपात में दूसरे और भ्रूण हत्या में तीसरे स्थान पर है। विवाह के लिए महिलाओं के अपहरण के मामलों में भी राजस्थान चैथे नंबर पर है। इस अपराध में बिहार टॉप, यूपी दूसरे और पंजाब तीसरे स्थान पर है। बिहार ‘पकड़वा विवाह’ के लिए भी बदनाम है, जिसमें पुरुषों का अपहरण कर जबरन शादी कर दी जाती है। यदि प्रति लाख आबादी के लिहाज से हत्या की दर का विश्लेषण किया जाए तो झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसे छोटे राज्य टॉप पर हैं और उत्तर प्रदेश जैसा बड़ा और अपराधों के लिए अक्सर चर्चा में रहने वाला राज्य 12वें स्थान पर। इस मामले में मध्यप्रदेश छठे और राजस्थान सातवें पायदान पर खड़ा है। बलात्कार, भू्रण हत्या, जबरन गर्भपात और विवाह के लिए अपहरण जैसी घटनाएं यह बताती हैं कि सामाजिक चेतना और नैतिक संस्कारों में गंभीर गिरावट आई है। महिलाओं के प्रति सम्मान, संवेदना और सुरक्षा की भावना कमजोर हुई है।
यह विडंबना ही है कि एक ओर हम ‘नारी शक्ति’ और ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान चला रहे हैं, वहीं दूसरी ओर महिलाओं के खिलाफ अपराधों के आंकड़े भयावह रूप लेते जा रहे हैं। यह केवल कानून की कमजोरी नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता की विकृति का भी परिणाम है। आज अपराध का स्वरूप भी तेजी से बदल रहा है। पहले अपराध सड़कों और गलियों तक सीमित थे, लेकिन अब इंटरनेट और डिजिटल तकनीक ने अपराध को नया चेहरा दे दिया है। साइबर अपराध, डिजिटल फ्रॉड, ऑनलाइन ठगी और डेटा चोरी जैसे अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। यह ‘सॉफ्टवेयर क्राइम’ का नया युग है, जहां अपराधी बिना हथियार और बिना जोखिम उठाए करोड़ों की ठगी कर रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि अब केवल परंपरागत पुलिसिंग से काम नहीं चलेगा। पुलिस और जांच एजेंसियों को डिजिटल फॉरेंसिक, साइबर सुरक्षा और डेटा एनालिटिक्स जैसे आधुनिक साधनों से लैस करना होगा। अपराध की नई दुनिया से लड़ने के लिए नई सोच और नई तकनीक की जरूरत है।
हालांकि कुछ संगीन अपराधों में मामूली कमी दर्ज की गई है, लेकिन इसे बहुत बड़ी उपलब्धि मान लेना आत्मप्रवंचना होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि नई भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) लागू होने के बाद कई अपराधों को संज्ञेय अपराधों की सूची से हटाया गया है, जिससे आंकड़ों में कमी दिखाई दे रही है। इसलिए अपराध के आंकड़ों का केवल सतही अध्ययन पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी गहराई से समीक्षा और विश्लेषण आवश्यक है। हमें यह समझना होगा कि अपराध केवल कानूनी समस्या नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक कारणों से पैदा होने वाली जटिल चुनौती है। अपराध के बढ़ने में सबसे बड़ा कारण नशा है। आज तो महिलाओं में बढ़ रही नशे की प्रवृत्ति अधिक चिन्ताजनक है। सबसे गंभीर संकेत विद्यार्थियों और बेरोजगार युवाओं में बढ़ती आत्महत्याओं के मामले हैं। यह स्थिति बताती है कि समाज में निराशा, असुरक्षा और भविष्य के प्रति अनिश्चितता का वातावरण गहराता जा रहा है। बेरोजगारी, प्रतिस्पर्धा, शिक्षा का बढ़ता दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं और सामाजिक तुलना युवाओं को मानसिक तनाव की ओर धकेल रही हैं। जब युवा अपने जीवन को अर्थहीन समझने लगें, तब यह केवल व्यक्तिगत त्रासदी नहीं होती, बल्कि राष्ट्र के भविष्य के लिए खतरे की घंटी होती है। इसलिए अपराध और आत्महत्या जैसी समस्याओं को केवल पुलिस या अदालतों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए शिक्षा, परिवार, समाज और शासन-सभी को मिलकर काम करना होगा। अपराध बढ़ने के पीछे एक बड़ा कारण नैतिक मूल्यों का क्षरण भी है। उपभोक्तावाद, भौतिकता और त्वरित सफलता की अंधी दौड़ ने व्यक्ति को संवेदनहीन और स्वार्थी बना दिया है। आज सफलता का मापदंड केवल पैसा और शक्ति बन गया है। जब समाज में ईमानदारी, संयम, करुणा और नैतिकता की जगह छल, लालच और प्रतिस्पर्धा ले लेते हैं, तब अपराध स्वाभाविक रूप से बढ़ते हैं। परिवारों में संवाद कम हुआ है, संस्कार कमजोर हुए हैं और सामाजिक जिम्मेदारी की भावना घटती जा रही है। सोशल मीडिया और मनोरंजन के अनेक माध्यमों ने भी हिंसा, अश्लीलता और त्वरित लाभ की मानसिकता को बढ़ावा दिया है। ऐसे में नई पीढ़ी का भटकना स्वाभाविक हो जाता है।
यह भी सच है कि कई बार अपराधियों में कानून का भय समाप्त होता जा रहा है। मुकदमों का वर्षों तक लंबित रहना, राजनीतिक संरक्षण, भ्रष्टाचार और कमजोर जांच व्यवस्था अपराधियों के मनोबल को बढ़ाते हैं। यदि अपराधी यह महसूस करने लगें कि वे आसानी से बच सकते हैं, तो अपराधों पर नियंत्रण कठिन हो जाता है। इसलिए न्याय व्यवस्था को तेज, पारदर्शी और प्रभावी बनाना समय की मांग है। अपराध के प्रति शून्य सहिष्णुता की नीति अपनानी होगी। कानून का भय तभी स्थापित होगा, जब अपराधी को शीघ्र और निष्पक्ष दंड मिलेगा। लेकिन केवल सरकार और पुलिस को दोष देकर समाज अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता। अपराधमुक्त समाज का निर्माण सामूहिक चेतना और सामाजिक सहभागिता से ही संभव है। समाज सुधारकों, शिक्षकों, धार्मिक संस्थाओं, सामाजिक संगठनों और परिवारों को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। बच्चों और युवाओं में नैतिक शिक्षा, संवेदनशीलता, सह-अस्तित्व और मानवीय मूल्यों का विकास करना होगा। समाज को ऐसी सकारात्मक दिशा देनी होगी, जहां व्यक्ति केवल अधिकारों की नहीं, बल्कि कर्तव्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व की भी चिंता करे।
आज आवश्यकता केवल अपराध रोकने की नहीं, बल्कि अपराध पैदा करने वाली परिस्थितियों को समाप्त करने की है। गरीबी, बेरोजगारी, नशाखोरी, अशिक्षा, सामाजिक असमानता, पारिवारिक विघटन और मानसिक तनाव जैसी स्थितियां अपराध की जमीन तैयार करती हैं। यदि इन कारणों पर गंभीरता से काम नहीं किया गया, तो अपराधों की संख्या घटाना कठिन होगा। इसलिए विकास की अवधारणा को केवल आर्थिक प्रगति तक सीमित नहीं रखा जा सकता। वास्तविक विकास वही है, जिसमें समाज सुरक्षित, संतुलित और मानवीय बने। एनसीआरबी के आंकड़े हमारे सामने एक कठोर सच रख रहे हैं। यह समय आंकड़ों पर औपचारिक चिंता जताने का नहीं, बल्कि गहन आत्ममंथन और ठोस कार्रवाई का है। यदि हम वास्तव में 2047 तक एक आदर्श, विकसित और सभ्य भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो अपराधमुक्त समाज निर्माण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। समाज में नैतिक चेतना, संवेदनशीलता और कानून के प्रति सम्मान का वातावरण निर्मित करना होगा। तभी हम एक ऐसे भारत की कल्पना कर सकेंगे, जहां विकास केवल इमारतों और तकनीक में नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और सामाजिक सुरक्षा में भी दिखाई दे।

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