“पत्रकारिता लोकतंत्र का आईना है, लेकिन जब आईना ही धुंधला हो जाए तो सच्चाई कहाँ दिखेगी?”
आज भारतीय पत्रकारिता एक दोराहे पर खड़ी है। एक ओर सत्ताधारी तंत्र का अनावश्यक दबाव है, तो दूसरी ओर वह मीडिया है जिसने अपने मूल धर्म को त्याग कर सत्ता की गोद में बैठना स्वीकार कर लिया है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ लगातार कमजोर होता जा रहा है और इसकी कीमत जनता चुका रही है।
सत्ता का बोझिल दबाव
सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। लेकिन आज स्थिति यह है कि सवाल पूछने वालों की आवाज़ दबा दी जाती है। कभी विज्ञापन रोक दिए जाते हैं, कभी छापेमारी कर पत्रकारों को डराया जाता है, तो कभी कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगवाए जाते हैं। नतीजा यह होता है कि पत्रकारिता का साहस टूटता है और सच्चाई पर ताले लग जाते हैं।
गोदी मीडिया का सच
कभी जो अख़बार और चैनल जनता की समस्याओं को अपना एजेंडा बनाते थे, वे आज सत्ता की जय-जयकार में व्यस्त हैं। बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मुद्दे हाशिए पर धकेल दिए गए हैं। जगह ले ली है चमक-दमक भरी डिबेट्स ने, जहाँ विपक्ष को कोसना और सत्ता की वाहवाही करना ही प्राथमिकता है। यही कारण है कि जनता ने इन्हें “गोदी मीडिया” कहना शुरू कर दिया।
लोकतंत्र पर चोट
जब जनता तक सच्चाई पहुँचाना बंद हो जाए, तो लोकतंत्र की नींव हिलने लगती है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि निरंतर सवाल पूछने और जवाबदेही तय करने से जीवित रहता है। यदि मीडिया सत्ता का प्रवक्ता बन जाएगा तो जनता अंधकार में जीने को मजबूर हो जाएगी।
उम्मीद की किरण
फिर भी उम्मीद बाकी है। देश की मिट्टी ने हमेशा ऐसे निर्भीक पत्रकार पैदा किए हैं जिन्होंने सच दिखाने के लिए जेल की सलाखों तक का सामना किया है। आज जरूरत है कि पत्रकारिता दोबारा अपने कर्तव्य को पहचाने और जनता की आवाज़ बने। लोकतंत्र तभी सांस ले पाएगा जब पत्रकारिता निर्भीक, निष्पक्ष और साहसी होगी।

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