भारतीय पर्वों में दीपावली का आध्यात्मिक, सामाजिक एवं पर्यावरणीय महत्व
भारतीय संस्कृति में दीपावली केवल दीप जलाने, मिठाइयाँ बाँटने और खुशियाँ मनाने का पर्व नहीं है, बल्कि यह अज्ञान पर ज्ञान, बुराई पर अच्छाई और अंधकार पर प्रकाश की विजय का महान संदेश देने वाला पर्व है। दीपावली का अपना एक गूढ़ आध्यात्मिक अर्थ और विशेष महत्व है।
भगवान बुद्ध ने कहा था – “अप्प दीपो भव” अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो। संत कबीर साहब ने भी बड़े ही सुंदर शब्दों में कहा है – “अपने घट दियना बारू रे।” अर्थात अपने शरीर रूपी घट में ज्ञान का दीपक जलाओ। इन महान संतों का संदेश है कि हमें बाहरी दीपावली के साथ-साथ अपने अंतर्मन में भी पारमार्थिक दीपावली मनानी चाहिए। हमारे भीतर ज्ञान, विवेक, वैराग्य, करुणा, दया, प्रेम, सद्भाव और मानवता के दीप प्रज्वलित होने चाहिए। क्योंकि जिस हृदय में सद्गुणों का प्रकाश नहीं, वहाँ लाखों दीपक जलाने के बाद भी वास्तविक उजाला नहीं हो सकता।
आज दीपावली का स्वरूप धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। खुशियों के इस पावन पर्व पर करोड़ों रुपये पटाखों पर खर्च कर दिए जाते हैं। कुछ लोग इसे परंपरा का हिस्सा मानते हैं, जबकि कुछ इसे अनावश्यक खर्च समझते हैं। लेकिन हमें यह विचार करना चाहिए कि क्या दूसरों के लिए परेशानी पैदा करके मनाई गई खुशी वास्तव में खुशी कहलाने योग्य है?
पटाखों से निकलने वाला धुआँ, जहरीली गैसें और हानिकारक रासायनिक कण वातावरण को प्रदूषित करते हैं। इनमें मौजूद तांबा, कैल्शियम, गंधक, एल्यूमीनियम और बेरियम जैसे तत्व वायु की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। ये प्रदूषक वातावरण में लंबे समय तक बने रह सकते हैं और सांस संबंधी बीमारियों को बढ़ा सकते हैं। पहले से ही प्रदूषण की मार झेल रहे हमारे शहरों में दीपावली के समय यह समस्या और गंभीर हो जाती है।
पटाखों का शोर भी किसी अभिशाप से कम नहीं है। तेज आवाज से छोटे बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, हृदय रोगियों और सांस के मरीजों को अत्यधिक परेशानी होती है। विशेष रूप से दमा के रोगियों के लिए पटाखों का धुआँ जानलेवा साबित हो सकता है। इतना ही नहीं, बेजुबान पशु-पक्षी भी इस शोर और धुएँ से भयभीत होकर तड़प उठते हैं। जरा सोचिए, जिस त्योहार पर हम अपने घरों को रोशन करते हैं, उसी त्योहार पर कितने बेजुबान जीवों का जीवन भय और पीड़ा से भर जाता है!
दीपावली का वास्तविक आनंद दूसरों के जीवन में खुशियाँ बाँटने में है। यदि हम पटाखों पर खर्च होने वाली धनराशि से किसी गरीब बच्चे की शिक्षा में सहयोग करें, किसी जरूरतमंद परिवार को कपड़े और मिठाइयाँ दें, भूखे को भोजन कराएँ अथवा किसी निराश चेहरे पर मुस्कान ले आएँ, तो इससे बड़ा उत्सव और क्या हो सकता है? भोजन की बर्बादी रोकना, मिट्टी के दीपक जलाना, प्राकृतिक सजावट अपनाना और पर्यावरण के अनुकूल वस्तुओं का उपयोग करना भी हमारी जिम्मेदारी है।
आज विज्ञान ने अपार प्रगति की है। आवश्यकता इस बात की है कि पटाखा निर्माता कम धुआँ और कम शोर उत्पन्न करने वाले सुरक्षित विकल्प विकसित करें तथा सरकार उनकी गुणवत्ता और पर्यावरणीय प्रभाव पर सख्ती से निगरानी रखे। साथ ही, हमें भी अपनी जिम्मेदारी समझते हुए प्रदूषण फैलाने वाले उत्पादों से दूरी बनानी चाहिए।
अंततः हमें यह समझना होगा कि दीपावली केवल घर के बाहर दीप जलाने का नहीं, बल्कि अपने भीतर सोई हुई मानवता को जगाने का पर्व है। जिस दीपक से किसी के जीवन में आशा का उजाला फैले, जिस मुस्कान से किसी दुखी चेहरे पर खुशी लौट आए और जिस सद्कर्म से प्रकृति की रक्षा हो, वही दीपक सच्चे अर्थों में दीपावली का दीपक है।
आइए, इस दीपावली पर हम संकल्प लें कि अपने भीतर अज्ञान का अंधकार मिटाकर ज्ञान का प्रकाश फैलाएँगे, घृणा के स्थान पर प्रेम, स्वार्थ के स्थान पर सेवा और दिखावे के स्थान पर सादगी को अपनाएँगे। याद दीप जलाना है तो किसी के जीवन में उम्मीद का दीप जलाइए, खुशी मनानी है तो किसी के चेहरे पर मुस्कान लाइए। धुआँ फैलाकर आसमान को अंधकारमय मत बनाइए, अपने सद्कर्मों से संसार को प्रकाशमय बनाइए। क्योंकि सच्ची दीपावली वह नहीं, जिसमें आसमान पटाखों से गूँज उठे, बल्कि वह है जिसमें हर हृदय प्रेम, करुणा, ज्ञान और मानवता के प्रकाश से जगमगा उठे। दीपावली पर केवल घर नहीं, अपना हृदय भी प्रकाशित करें। यही सच्ची दीपावली है, यही मानवता का संदेश है।
डॉ नन्दकिशोर साह

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