श्रीकृष्ण जन्मोत्सव : आत्मबोध और तत्वदर्शी सद्गुरु की खोज
उत्सव से आगे बढ़कर श्रीकृष्ण के ज्ञान को समझने और जीवन में उतारने का अवसर है जन्माष्टमी
रामनरेश प्रजापति पत्रकार, गोल्ड मेडलिस्ट जनसंचार एवं पत्रकारिता वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय जौनपुर उत्तर-प्रदेश
हर वर्ष जन्माष्टमी आती है। मंदिर सजते हैं, झांकियां निकलती हैं और आधी रात को भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन एक प्रश्न इस अवसर पर हमारे सामने भी होना चाहिए—क्या श्रीकृष्ण जन्मोत्सव केवल उनके जन्म की खुशी मनाने का पर्व है या उनके संदेश को समझने और अपने जीवन को उसके अनुरूप देखने का अवसर भी?
सनातन परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण को परम सत्य और परमात्मा के स्वरूप के रूप में स्वीकार किया गया है। उनके उपदेशों का प्रमुख आधार श्रीमद्भगवद्गीता है। कुरुक्षेत्र में अर्जुन के मोह और संशय के बीच दिया गया श्रीकृष्ण का संदेश आज भी मनुष्य को कर्म, कर्तव्य, आत्मसंयम और ज्ञान की ओर प्रेरित करता है। इसलिए श्रीकृष्ण को समझने का अर्थ केवल उनके जीवन-प्रसंगों को जानना नहीं, बल्कि उनके संदेश के मर्म को समझना भी है।
गीता के चौथे अध्याय के 34वें श्लोक में कहा गया है—
“तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः॥”
यहां ज्ञान की प्राप्ति के लिए विनम्रता, प्रश्न और सेवा के साथ तत्वदर्शी ज्ञानी के मार्गदर्शन की बात कही गई है। यही विचार तत्वदर्शी सद्गुरु की खोज को महत्वपूर्ण बनाता है। सद्गुरु की पहचान केवल किसी दावे, वेशभूषा या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके ज्ञान, आचरण और मनुष्य को सत्य, विवेक तथा सदाचार की ओर ले जाने वाले मार्गदर्शन से होनी चाहिए।
श्रीकृष्ण और अर्जुन का संबंध गुरु-शिष्य परंपरा का श्रेष्ठ उदाहरण है। अर्जुन युद्धभूमि में अपने कर्तव्य को लेकर दुविधा में थे। श्रीकृष्ण ने उन्हें कर्म से पलायन नहीं, बल्कि अपने धर्म और कर्तव्य को समझकर कर्म करने का संदेश दिया। गीता के 11वें अध्याय में अर्जुन को विराट स्वरूप के दर्शन का प्रसंग मिलता है। यह प्रसंग आध्यात्मिक दृष्टि से इस बात का संकेत देता है कि सत्य की अनुभूति के लिए केवल बाहरी दृष्टि पर्याप्त नहीं, अंतर्दृष्टि और पात्रता भी आवश्यक है।
भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में गुरु-शिष्य संबंध के अनेक उदाहरण मिलते हैं। नारद और ध्रुव, श्रीकृष्ण और अर्जुन तथा रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के प्रसंग इस परंपरा की अलग-अलग झलक प्रस्तुत करते हैं। स्वामी विवेकानंद के जीवन में ईश्वर को जानने की तीव्र जिज्ञासा ने उन्हें रामकृष्ण परमहंस के संपर्क तक पहुंचाया। यह प्रसंग बताता है कि सच्ची जिज्ञासा मनुष्य को अपने प्रश्नों के उत्तर की खोज के लिए प्रेरित करती है।
सत्य की खोज का यह भाव किसी एक परंपरा तक सीमित नहीं है। ईसाई धर्मग्रंथ में यीशु का संदेश है—“मांगो, खोजो और खटखटाओ” (मत्ती 7:7), जिसमें मांगने, खोजने और द्वार खटखटाने वाले के लिए मिलने और द्वार खुलने का भाव व्यक्त होता है। इसे व्यापक अर्थ में आध्यात्मिक जिज्ञासा और सत्य की तलाश के संदेश के रूप में देखा जा सकता है।
गुरबाणी में भी शाश्वत सत्य की ओर संकेत मिलता है—
“आदि सचु, जुगादि सचु, है भी सचु, नानक होसी भी सचु।”
संत कबीर ने इसी सत्य को आत्मचिंतन की भाषा में कहा—
“जल में कुंभ, कुंभ में जल है, बाहरि भीतरि पानी।
फूटा कुंभ जल जलहि समाना, यह तत कहै गियानी॥”
अलग-अलग आध्यात्मिक परंपराओं की भाषा और साधना-पद्धति भिन्न हो सकती है, लेकिन मनुष्य को सत्य, सदाचार और आत्मचिंतन की ओर ले जाने वाला संदेश उनमें महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
श्रीकृष्ण के संदेश में धर्म केवल बाहरी कर्मकांड नहीं, बल्कि कर्तव्य और आचरण से भी जुड़ा है। गीता के चौथे अध्याय में श्रीकृष्ण कहते हैं—“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत…” (4.7) और धर्म की स्थापना के लिए अपने प्राकट्य की बात करते हैं। वहीं 18वें अध्याय में वे कहते हैं—“सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज…” (18.66)। इन वचनों को मनुष्य के भीतर के मोह, अहंकार और संशय से ऊपर उठकर सत्य तथा कर्तव्य की ओर बढ़ने के संदेश के रूप में भी समझा जा सकता है।
आज आध्यात्मिक क्षेत्र में अनेक गुरु और मार्गदर्शक हैं। ऐसे वातावरण में श्रद्धा के साथ विवेक का होना भी आवश्यक है। किसी भी आध्यात्मिक दावे को केवल भावनाओं के आधार पर स्वीकार करने के बजाय उसके ज्ञान, आचरण, नैतिकता और समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को देखना चाहिए। शास्त्रों का अध्ययन, प्रश्न करने की स्वतंत्रता और अपने विवेक का प्रयोग व्यक्ति को अंधानुकरण से बचा सकता है।
इसी अर्थ में तत्वदर्शी सद्गुरु की खोज किसी व्यक्ति विशेष की अंधभक्ति नहीं, बल्कि सत्य और सही ज्ञान की खोज है। गीता, रामचरितमानस, गुरबाणी और संतवाणी जैसी परंपराएं मनुष्य को अपने भीतर झांकने, अपने आचरण को परखने और जीवन को अधिक सार्थक बनाने की प्रेरणा देती हैं।
श्रीकृष्ण जन्मोत्सव का सार भी यहीं दिखाई देता है। जन्माष्टमी हमें केवल यह स्मरण नहीं कराती कि श्रीकृष्ण का जन्म हुआ था; वह यह प्रश्न भी हमारे सामने रखती है कि क्या उनके ज्ञान ने हमारे जीवन को बदला? यदि जन्मोत्सव के बाद हमारा कर्म अधिक जिम्मेदार, व्यवहार अधिक करुणामय, विचार अधिक विवेकपूर्ण और जीवन सत्य की ओर अधिक उन्मुख होता है, तभी उत्सव अपने गहरे अर्थ को प्राप्त करता है।
जन्माष्टमी का दीप तभी सार्थक है, जब वह मंदिर के साथ हमारे भीतर भी प्रकाश करे। श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव तभी पूर्ण होगा, जब उनके ज्ञान से हमारा मोह घटे, कर्तव्य के प्रति हमारी निष्ठा बढ़े और सत्य को जानने की हमारी जिज्ञासा जागे। आखिरकार, श्रीकृष्ण को जानने की यात्रा केवल एक धार्मिक प्रश्न नहीं—यह स्वयं को जानने की यात्रा भी है।

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