“शाकाहार और अहिंसा हिंदू और सनातन धर्म के मूल आदर्श”: गो स्पिरिचुअल के संस्थापक सोनू त्यागी
देवदत्त पटनायक के मांसाहार और प्राचीन हिंदू ग्रंथों से जुड़े तर्कों पर सोनू त्यागी का कड़ा जवाब, कहा—चुनिंदा संदर्भों से सनातन धर्म की अहिंसा, करुणा और जीव-दया की परंपरा को नहीं किया जा सकता नजरअंदाज
मुंबई: गो स्पिरिचुअल के संस्थापक सोनू त्यागी ने लेखक और मिथक विशेषज्ञ देवदत्त पटनायक के शाकाहार, मांसाहार और प्राचीन हिंदू ग्रंथों को लेकर दिए गए विचारों का कड़ा विरोध किया है। त्यागी ने कहा कि शाकाहार, अहिंसा, करुणा और जीवों के प्रति दया हिंदू और सनातन धर्म के मूल आदर्श हैं। हजारों साल पुराने ग्रंथों के कुछ चुनिंदा संदर्भों के आधार पर सनातन धर्म की पूरी सोच और परंपरा को नहीं समझा जा सकता।
हाल में देवदत्त पटनायक ने शाकाहार और मांसाहार को लेकर अपने विचार रखे हैं। उन्होंने प्राचीन हिंदू ग्रंथों में पशु बलि और मांस खाने से जुड़े कई संदर्भों का जिक्र किया है। इसके साथ ही उन्होंने शाकाहार को जाति, शुद्धता और सामाजिक ताकत जैसे विषयों से भी जोड़ा है।
सोनू त्यागी का कहना है कि हिंदू और सनातन धर्म को केवल इस आधार पर नहीं देखा जा सकता कि हजारों साल पहले किसी समय कुछ लोग क्या खाते थे या उस समय कौन-सी प्रथाएं प्रचलित थीं। सनातन धर्म की असली ताकत उसकी आध्यात्मिक सोच और समय के साथ मनुष्य को बेहतर और दयालु बनाने की शिक्षा में है।
सोनू त्यागी ने कहा, “सनातन धर्म हमें दया, प्रेम, अहिंसा, संयम और सभी जीवों के सम्मान की शिक्षा देता है। मेरे लिए शाकाहार केवल भोजन की आदत नहीं है। यह जीवों के प्रति दया और अहिंसा का रास्ता है। अगर हम किसी जीव को मारे बिना स्वस्थ जीवन जी सकते हैं, तो केवल स्वाद के लिए किसी जीव की जान क्यों ली जाए?”
उन्होंने कहा कि शाकाहार को केवल जाति से जोड़कर देखना भी सही नहीं है। दया किसी एक जाति या समाज की नहीं होती। कोई भी व्यक्ति, चाहे वह किसी भी जाति, धर्म, वर्ग या विचार से आता हो, जीवों के प्रति दया रख सकता है और शाकाहार अपना सकता है।
त्यागी ने कहा, “जिस जानवर को काटने के लिए ले जाया जा रहा है, उसे हमारी जाति या राजनीति से कोई मतलब नहीं है। वह केवल डर और दर्द महसूस करता है। वह भी जीना चाहता है। इसलिए सवाल बहुत सीधा है—अगर हमारे पास बिना किसी जानवर को मारे भोजन करने का विकल्प है, तो हमें दया का रास्ता क्यों नहीं चुनना चाहिए?”
उन्होंने यह भी साफ किया कि केवल शाकाहारी होने से कोई व्यक्ति अपने आप अच्छा इंसान नहीं बन जाता। इंसान की अच्छाई उसके पूरे व्यवहार और कर्मों से तय होती है। लेकिन इसका यह मतलब भी नहीं है कि भोजन के लिए किसी जीव की जान लेने के सवाल को नजरअंदाज कर दिया जाए।
त्यागी ने कहा, “कोई शाकाहारी व्यक्ति भी गलत काम कर सकता है और कोई मांसाहारी व्यक्ति कई अच्छे गुणों वाला हो सकता है। हमारा उद्देश्य किसी इंसान को छोटा या बड़ा बताना नहीं है। हमारा सवाल केवल इतना है कि जहां हिंसा से बचा जा सकता है, वहां हम अहिंसा को क्यों न चुनें?”
गो स्पिरिचुअल का कहना है कि प्राचीन हिंदू साहित्य बहुत विशाल है। ये ग्रंथ अलग-अलग समय में लिखे गए और उनमें अलग-अलग तरह के धार्मिक, सामाजिक और आध्यात्मिक विचार मिलते हैं। इसलिए किसी एक समय या किसी एक प्रथा को पूरे सनातन धर्म की पहचान बना देना ठीक नहीं है।
सोनू त्यागी ने कहा, “अगर इतिहास में कहीं मांस खाने या पशु बलि का उल्लेख मिलता भी है, तो उसे छिपाने की जरूरत नहीं है। लेकिन केवल उन्हीं बातों को उठाकर यह कहना भी सही नहीं है कि यही सनातन धर्म की पहचान है। इतिहास हमें बताता है कि अलग-अलग समय में क्या हुआ, जबकि धर्म हमें सिखाता

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