देश के गौरव : सिपाही छत्ता सिंह, विक्टोरिया क्रास
वीरता दिवस पर विशेष
प्रथम विश्व युद्ध 28 जुलाई, 1914 से 11 नवंबर, 1918 तक मुख्य शक्तियों – जर्मनी, ऑस्ट्रिया-हंगरी, ऑटोमन साम्राज्य , बुल्गारिया और मित्र देशों – फ्राँस, रूस, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका के मध्य लड़ा गया । चूँकि इस युद्ध में ब्रिटेन भी शामिल था और उन दिनों भारत पर ब्रिटेन का शासन था, इस कारण हमारे भारतीय सैनिकों को भी इस युद्ध में शामिल होना पड़ा। इस युद्ध में कुल 8 लाख भारतीय सैनिकों ने मेसोपोटेमिया (इराक) की लड़ाई से लेकर पश्चिम यूरोप, पूर्वी एशिया के कई मोर्चे पर और मिस्र तक जा कर लड़ाई लड़ी और अपने साहस तथा वीरता के बल पर एक इतिहास लिखा । वीरता और साहस का एक ऐसा ही इतिहास उत्तर प्रदेश के कानपुर नगर के सिपाही छत्ता सिंह ने लिखा जो पुरे प्रदेश ही नहीं देश को गौरवान्वित करता है ।
सिपाही छत्ता सिंह 9वीं भोपाल इन्फैंट्री में तैनात थे। प्रथम विश्व युद्ध में उनकी यूनिट को भी युद्ध में मेसोपोटामिया (आज के इराक) में वादी की लड़ाई में भेजा गया । 13 जनवरी 1916 को युद्ध अपने चरम पर था। दोनों ओर से गोलियों की बौछार हो रही थी। इसी बीच इस युद्ध में इनके कमान अधिकारी बुरी तरह घायल हो गए। सिपाही छत्ता सिंह की नजर खुले में घायल पड़े अपने कमान अधिकारी पर पड़ी, उन्होंने बिना समय गंवाए उन्हें सुरक्षित स्थान पर ले गए और उनके घाव का प्राथमिक उपचार किया । अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना भीषण गोलीबारी के बीच कमान अधिकारी को बचाने के लिए अपने खाई खुदाई करने वाले औजारों से उनके लिए एक गहरा गड्ढा खोदा।
इस दौरान राइफलों से हो रही भारी गोली-बारी के बीच जानलेवा असुरक्षा का सामना करते रहे। उन्होंने प्राकृतिक आड़ में ही बाहर निकलना सुरक्षित समझा और अंधेरा होने का इंतजार किया। अंधेरा होने तक लगभग पांच घंटे वह अपने घायल कमान अधिकारी के पास डटे रहे। खुले हिस्से की ओर से अपने शरीर की आड़ देकर उन्हें बचाते रहे। अँधेरा होने पर वह अपनी यूनिट के सैनिकों के पास गये और सहायता के लिए कुछ और लोगों को लेकर आए । अपनी सूझ-बूझ और कर्त्तव्यनिष्ठा से असहाय घायल पड़े अपने कमान अधिकारी को उन्होंने बचा लिया। उनकी इस बहादुरी, सूझ-बूझ और कर्त्तव्यनिष्ठा के लिए उन्हें विक्टोरिया क्रॉस प्रदान करने की घोषणा की गयी, जिसका गजट नोटिफिकेशन 21 जून 2016 को किया गया । 30 जनवरी 1917 को दिल्ली में आयोजित एक भव्य परेड में तत्कालीन गवर्नर जनरल लार्ड चेम्सफोर्ड ने विक्टोरिया क्रास प्रदान किया गया। सिपाही छत्ता सिंह को बाद में पदोन्नति देकर हवलदार बना दिया गया।
सिपाही छत्ता सिंह सिंह का जन्म 1886 में उत्तर प्रदेश के जनपद कानपुर की घाटमपुर तहसील के एक छोटे से गांव तिलसड़ा में श्रीमती ननकी सिंह और श्री ईश्वरी सिंह के यहाँ हुआ था। वह कम उम्र में ही सेना में भर्ती हो गये । बाद में उनका विवाह राजकुमारी सिंह से हुआ। उनके पांच पुत्र और पांच पुत्रियाँ हुई। सेना की सेवा के बाद वह अपने पैतृक गांव में रहने लगे। 28 मार्च 1961 को 75 वर्ष की आयु में हवलदार छत्ता सिंह का उनके पैतृक गांव तिलसडा़ में निधन हो गया।
आपको बताते चलें कि ब्रिटिश काल का यह सर्वोच्च सम्मान विक्टोरिया क्रास आज के परमवीर चक्र के समकक्ष है। प्रथम विश्व युद्ध में 11 देशों के कुल 175 सैनिकों को यह सम्मान प्रदान किया गया था जिसमें 06 भारतीय सैनिकों को यह सम्मान दिया गया था , जिनके सिपाही छत्ता सिंह भी शामिल थे। सिपाही छत्ता सिंह के अलावा उत्तर प्रदेश में यह सम्मान द्वितीय विश्व युद्ध में गोरखपुर के निवासी लेफ्टिनेंट जनरल प्रेमेंद्र सिंह भगत को प्रदान किया गया है।
विक्टोरिया क्रास जैसे वीरता पदक से अलंकृत हुए 110 साल बीत जाने के बाद भी, देश के इस वीर योद्धा को वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वह हकदार थे। केंद्र और उत्तर प्रदेश में सरकारें बदलती रहीं , किंतु इस वीर के सम्मान का स्तर बदलने के लिए अब तक कोई सार्थक कदम सामने नहीं आया है। उत्तर प्रदेश में पूर्ववर्ती सरकार के दौरान उनके गांव में स्मारक बनाने के लिए धन आवंटित गया, उनके परिवार ने स्मारक के लिए अपनी जमीन भी दी। उस स्मारक में प्रतिमा बनकर तैयार है लेकिन स्मारक का विमोचन करने के लिए न तो सेना के पास समय है और न ही सूबे की सरकार के पास ।
हवलदार छत्ता सिंह का परिवार बदहाल जिंदगी जीने पर मजबूर है, घर गिरकर मिट्टी में मिल चुका है | परिवार के लोग दिहाड़ी मजदूर बन चुके हैं । झोपड़ी में रहने वाले वीर छत्ता सिंह के परिवार को आज तक आवास योजना का लाभ भी नही मिला है। देश में राष्ट्रीय पर्वों और सैनिक दिवसों पर वीरता पदक विजेताओं / आश्रितों , सेवानिवृत्त सैनिकों और दिवंगत सैनिकों की पत्नियों को सैनिक कल्याण से जुड़े संस्थानों में बुलाया जाता है लेकिन यह परिवार इस सम्मान से भी वंचित है । छत्ता सिंह के पौत्र बधू के अनुसार जब देश ने आजादी की रजत जयन्ती मनायी थी, तब प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी ने हमारे दादा को दिल्ली बुलवाया था और दादा जी को संग्राम मेडल दिया था। प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने तिलसड़ा गांव के विकास के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को पत्र लिखने के साथ हमारे परिवार के एक युवक को नौकरी देने की भी बात कही थी।
हवलदार छत्ता सिंह की पौत्र बधू ने बताया कि सन 2017 में प्रतिमा बनकर तैयार हो गई थी, उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या को बीते 25 अक्टूबर 2017 को गांव आकर स्मारक का लोकापर्ण करना था। डिप्टी सीएम के आगमन के कारण स्थानीय अधिकारियो द्वारा हमारे गांव में साफ सफाई कराई गई थी। कई अधिकारी निरीक्षण के लिए गाँव में भी आये थे किन्तु उसी दिन चुनाव आचार संहिता लागू होने के कारण उनका आगमन निरस्त हो गया। तब से लेकर आज तक 08 वर्ष बीत गए हैं और हमारे दादा की प्रतिमा शबरी की तरह नीति नियंताओं की बाट जोह रही है ।
– हरी राम यादव
स्वतंत्र लेखक
7087815074

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