राजा बेल्हा (बहला) पासी का इतिहास
प्रतापगढ़ की लोककथाओं और किंवदंतियों में महाराजा बहला पासी को ही राजा बेल्हा पासी के नाम से जाना जाता है। उनका नाम आज भी प्रतापगढ़ के पासी समाज में सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है।
12वीं–13वीं शताब्दी में पासी शासन
12वीं से 13वीं शताब्दी के मध्य प्रतापगढ़ तथा उससे सटे क्षेत्रों में अनेक पासी राजा शासन कर रहे थे। ये सभी हुंडौर के पासी राजा के नेतृत्व में अपने-अपने राज्यों का संचालन करते थे।
इसका उल्लेख डिस्ट्रिक्ट गजेटियर, प्रतापगढ़ तथा हिस्ट्री ऑफ सोमवंश जैसी ऐतिहासिक पुस्तकों में मिलता है।
इन ग्रंथों के अनुसार उस काल में प्रतापगढ़ पर मुख्यतः पासियों का अधिकार था। उनके किले और गांव पूरे जिले में फैले हुए थे, जिनके अवशेष आज भी देखे जा सकते हैं। पासियों के कई सरदार थे, परंतु उनमें एक प्रमुख राजा हंडौर में निवास करता था, जो प्रतापगढ़ से लगभग 12 मील दूर रायबरेली मार्ग पर स्थित था। वह एक सुदृढ़ किले में रहता था और उसके पास विशाल सेना थी। जिले के दक्षिणी हिस्से में उस समय रायकवार क्षत्रियों का प्रभुत्व था।
राजा बेल्हा पासी और बेल्हागढ़ की स्थापना
प्रतापगढ़ के पासी समाज में राजा बेल्हा पासी की कथा घर-घर में प्रचलित है।
बेल्हागढ़ की स्थापना रहस्य, साहस और वीरता से भरी एक अद्भुत गाथा है। यह उस दौर की कहानी है जब उत्तर भारत में छोटी-छोटी रियासतें अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थीं। उन्हीं में से एक थी बेल्हागढ़, जो आज के प्रतापगढ़ जिले के रूप में जानी जाती है।
गजेटियर में उल्लेख
Gazetteer of the Province of Oudh (Vol. I – A to G) के अनुसार बेला प्रतापगढ़ जिले का एक कस्बा है, जिसका नाम माता बेला देवी के नाम पर पड़ा। सई नदी के किनारे स्थित बेला देवी का मंदिर आज भी श्रद्धा का केंद्र है।
सन 1209 ई. में इस स्थान को अवध की सहायक सेना की छावनी के रूप में बसाया गया था।
गजेटियर में जिस सैनिक छावनी का उल्लेख है, वह राजा बहला पासी के नेतृत्व में स्थापित की गई थी। अवध के पासी राजाओं के निर्देश पर, युवावस्था में ही राजा बहला पासी ने घने जंगलों से घिरे बेल्हा क्षेत्र में सैनिकों को संगठित कर एक विशाल छावनी का निर्माण कराया। आगे चलकर यही छावनी एक मजबूत किले में परिवर्तित हो गई।
इस किले के चारों ओर गहरी खाइयाँ और ऊँची दीवारें थीं, जो इसे दुश्मनों के लिए अभेद्य बनाती थीं। यह किला न केवल उनकी सेना का मुख्यालय था, बल्कि बेला देवी के प्रति उनकी आस्था का भी प्रतीक था। राजा बहला पासी अपने राज्य में शांति, सुरक्षा और समृद्धि बनाए रखने के लिए सदैव तत्पर रहते थे।
संघर्ष और पतन
यह राज्य क्षेत्र के लोगों को न केवल सुरक्षा देता था, बल्कि उन्हें एक अलग पहचान और स्वाभिमान भी प्रदान करता था।
लेकिन प्रतापगढ़ के रायकवार राजपूतों ने पासी शासकों के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया। अनेक पासी राजाओं को पराजित कर उन्होंने जिले के लगभग एक-तिहाई हिस्से पर कब्जा कर लिया।
रायकवारों की दमनकारी नीति के विरुद्ध राजा बहला पासी ने अपनी सेना को संगठित किया और उनका प्रतिरोध किया। परंतु समय के साथ संघर्ष और व्यापक हो गया।
दिल्ली सल्तनत और अंतिम संघर्ष
सन 1245 ई. में दिल्ली की सत्ता पर सुल्तान नसीरुद्दीन महमूद का शासन स्थापित हुआ। उसके काल में बलबन ने विद्रोहों को दबाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अवध के विद्रोही पासी राजाओं को दबाने के लिए बलबन को सेनापति नियुक्त किया गया।
इसी समय सोमवंशी राजपूत लखन सेन, दिल्ली सल्तनत के सहयोग से, बलबन के नेतृत्व में पासी राजाओं के विरुद्ध युद्ध में उतरे। प्रतापगढ़ के अनेक पासी राज्यों के साथ-साथ राजा बहला पासी का बेल्हागढ़ भी इस विशाल सेना की चपेट में आ गया।
सन 1258 ई. तक सोमवंशी राजपूतों ने झूंसी स्टेट सहित पूरे क्षेत्र पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। कालांतर में प्रतापगढ़ को ‘अरोड़ राज्य’ के नाम से भी जाना गया।
निर्वासन और नया राज्य
हिस्ट्री ऑफ सोमवंश (पृष्ठ 15) में उल्लेख मिलता है कि सोमवंशी राजपूतों के नरसंहार के कारण बचे हुए भर/पासी जंगलों में चले गए या अन्य जिलों में पलायन कर गए।
राजा बहला पासी भी बेल्हागढ़ का किला हारने के बाद अपने परिवार के साथ सुरक्षित रूप से बाराबंकी की ओर प्रस्थान कर गए।
लेकिन जिनके रक्त में शासन होता है, वे गुमनाम जीवन नहीं जीते।
भिलवल राज्य की स्थापना
बाराबंकी के हैदरगढ़ तहसील में राजा बहला पासी ने पुनः पासियों को संगठित किया और भिलवल राज्य की स्थापना की।
डिस्ट्रिक्ट गजेटियर, प्रोविंसेस ऑफ अवध (वॉल्यूम 1, पृष्ठ 281) में स्पष्ट उल्लेख है कि बाराबंकी के भिलवल क्षेत्र की स्थापना महाराजा बहला पासी ने की थी।

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