महाराजा बिजली पासी जयंती ( 1973 से 2025 और उसके आगे….)
राजेश पासी
इस वर्ष 25 दिसंबर 2025 को महाराजा बिजली पासी की जयंती पूरे देश में जिस भव्यता और व्यापकता के साथ मनाई गई, वह पासी समाज के इतिहास में अपने-आप में एक ऐतिहासिक क्षण है।इस बार की सबसे बड़ी और खास बात यह रही कि महाराजा बिजली पासी की जयंती की शुभकामनाएँ केवल पासी समाज तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि दूसरे समाजों के लोगों ने भी बढ़-चढ़कर शुभकामनाएँ दीं।सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म महाराजा बिजली पासी जयंती से जुड़ी पोस्टों, संदेशों और चर्चाओं से भरे पड़े थे।नेता, मंत्री और कई जनप्रतिनिधियों ने सार्वजनिक रूप से महाराजा बिजली पासी को याद किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्य मंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने भी मंच से महाराजा बिजली पासी जी को स्मरण किया।निस्संदेह यह पासी समाज के लिए एक बड़ी उपलब्धि और सफलता है।लेकिन यह सफलता अचानक नहीं मिली है।�यह किसी एक दिन, एक कार्यक्रम या एक व्यक्ति का परिणाम नहीं है।यह समाज के लोगों की वर्षों की निरंतर मेहनत, संघर्ष और समर्पण का फल है।सैकड़ों नहीं, बल्कि हज़ारों लोगों ने समाज और उसके इतिहास के लिए अलग-अलग स्तर पर कार्य किया है।�यह उपलब्धि किसी एक संगठन, एक नेता या एक सरकार की नहीं, बल्कि पूरे पासी समाज के साझा प्रयासों का नतीजा है।पिछले लगभग 70 वर्षों में कई ऐसे अवसर आए जब पासी समाज के लोगों ने अपने इतिहास को स्थापित करने के लिए ठोस और निर्णायक कदम उठाए।�ऐसे कई टर्निंग पॉइंट आए, जिन्होंने पासी समाज के इतिहास को न केवल समाज के भीतर, बल्कि दूसरे समाजों और पूरे देश तक पहुँचाने में अहम भूमिका निभाई।
इन्हीं घटनाओं और प्रयासों को समझना आज की स्थिति को सही संदर्भ में देखने के लिए ज़रूरी है।
आगे बढ़ने से पहले मैं स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि यह लेख मैंने केवल अपने अनुभव और अपनी जानकारी के आधार पर लिखा है।यह लेख पासी समाज का आधिकारिक प्रतिनिधित्व नहीं करता।यह पूरी तरह से मेरा व्यक्तिगत दृष्टिकोण है, जिसे मैं आप सभी के सामने रख रहा हूँ।इस लेख में सबके नाम नहीं लिख सकता ना ही सभी संगठनों के नाम लिख सकता हूँ आशा है इस बात को आप समझेंगे!
पासी इतिहास की नींव : शोध और लेखन
पासी इतिहास को संगठित रूप में सामने लाने की शुरुआत आजादी के के काफ़ी पहले 1930 के दशक में ही शुरुआत हो गई थी! पासी समाज के श्री राम सहाय चौधरी जिन्हें अंग्रेजों के जमाने में राय की उपाधि मिली थी पासी समाज को संगठित और पासी के इतिहास के बारे में जागरूक करने की शुरुआत कर दी थी! पासी पंचायत कायक्रम के नाम से देश के कोने कोने से पासी समाज के लोग समाज की चर्चा करने के लिए इकट्ठा होने लगे थे! लखनऊ,में ही पासी जागृति मंडल की स्थापना हुई और यही से पासी समाज के आधिकारिक संगठन बनाने की शुरुआत हुई! बाद के वर्षों में पासी समाज के बड़े नेता जैसे धर्मवीर जी, रामलाल राही जी, शिव बालक जी जैसे कई सम्मानित लोगों ने 60-70 के दशक में पासी समाज के इतिहास के बारे में लोगों को जागरूक करना शुरू किया! उसके बाद के दशकों में पासी समाज के इतिहासकारों ने महाराजा बिजली पासी के इतिहास की खोज और उस पर किताबें लिखने की शुरुआत की! पासी समाज के कई इतिहासकारों ने अपने-अपने स्तर पर समाज के राजा-महाराजाओं और वीर व्यक्तित्वों पर शोध किया और पुस्तकों के माध्यम से इतिहास को दर्ज किया।श्री राजकुमार, श्री आर. ए. प्रसाद, श्री के. पी. राहुल जैसे अनेक इतिहासकारों ने महाराजा बिजली पासी और पासी समाज के इतिहास को समाज और देश के सामने रखने का कार्य किया।
जयंती की शुरुआत और पहली तस्वीर
महाराजा बिजली पासी की पहली मूर्ति दाऊ जी गुप्त और समाज के साथियों के सहयोग से साल 1973 में लगाई गई! उसी के बाद से महाराजा बिजली पासी की जयंती हर साल मनाई जाने लगी! शुरुआत लखनऊ से हुई थी बाद में अलग अलग जगहों पर जयंती मनाई जाने लगी! । उसी दशक में समाज के इतिहासकारों ने महाराजा बिजली पासी की पहली तस्वीर भी बनाई थी ।यह एक हाथ से बनाई गई तस्वीर थी।यही पहली तस्वीर महाराजा बिजली पासी की पहचान बनी, और आज भी उनके स्वरूप का मूल आधार यही चित्र है।
माता ऊदा देवी पासी : शौर्य और बलिदान का पुनर्प्रकाश
दाऊ जी गुप्त का बड़ा योगदान था माता ऊदा देवी के इतिहास को खोज कर देश के सामने रखने में और लखनऊ में उनकी मूर्ति स्थापित करने में! दाऊजी गुप्त जी ने अपने इंग्लैंड दौरे के दौरान वे माता ऊदा देवी पासी के शौर्य और बलिदान का इतिहास खोजकर समाज के सामने लाए।लखनऊ के सामाजिक साथियों ने माता ऊदा देवी की मूर्ति लखनऊ में स्थापित कर पूरे देश के सामने उनके बलिदान और पासी समाज के गौरवशाली इतिहास को प्रस्तुत किया।
2005 : डाक टिकट – राष्ट्रीय मान्यता का क्षण
पासी समाज के इतिहास में एक बड़ा और निर्णायक मोड़ वर्ष 2005 में आया, जब तत्कालीन संचार मंत्री श्री राम विलास पासवान जी ने महाराजा बिजली पासी के नाम पर डाक टिकट जारी किया।यह पहली बार था जब इतने बड़े राष्ट्रीय स्तर पर पासी समाज के इतिहास को औपचारिक मान्यता मिली।यह क्षण पासी समाज के लिए ऐतिहासिक था।
किले की ज़मीन और राजनीतिक समर्थन
मायावती की सरकार के दौरान लखनऊ में महाराजा बिजली पासी के किले के लिए ज़मीन आवंटित की गई।इस फैसले ने पासी समाज के इतिहास को और अधिक संस्थागत और मज़बूत आधार प्रदान किया।
पत्रिका और संगठनों की भूमिका
इन घटनाओं के बाद देशभर में पासी समाज के इतिहास को लेकर जागरूकता बढ़ी।पासी समाज के कई संगठन बने और अपने अपने स्तर कर कार्य करने लगे �हालाँकि उस समय इंटरनेट और सोशल मीडिया शुरुआती दौर में थे, फिर भी लोगों ने बातचीत शुरू की, संगठन बने और कार्यक्रम आयोजित होने लगे।
श्री पासी सत्ता पत्रिका ने इस दौरान बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।जब सोशल मीडिया मौजूद नहीं था, तब इस पत्रिका ने न केवल पासी समाज के भीतर बल्कि दूसरे समाजों तक भी पासी इतिहास को पहुँचाने का कार्य किया।पत्रिका के संपादक डॉ. अजय सरोज जी समाज के साथ-साथ अन्य समाजों के कार्यक्रमों में भी उपस्थित रहते थे और वहाँ पासी समाज के इतिहास को सामने रखते थे।
2015 : तस्वीर का पुनर्जन्म – सुपर 50
महाराजा बिजली पासी की पहचान बनी 70 के दशक में बनाई गई मूर्ति और की हाथ से बनाई गई तस्वीर ही वर्षों तक उनकी छवि रही।लेकिन वर्ष 2015 में प्रयागराज के साथियों — श्री नरेंद्र पासी, सतीश पासी और उनकी सुपर 50 टीम — ने उसी मूल तस्वीर को आधार बनाकर महाराजा बिजली पासी की एक नई, आधुनिक और प्रभावशाली तस्वीर तैयार की।यही वह तस्वीर है, जिसे आज हम पूरे देश में देखते हैं।सुपर 50 टीम ने उस वर्ष प्रयागराज की सड़कों को महाराजा बिजली पासी के विशाल बैनरों से ढक दिया था।यह कार्यक्रम नए ज़माने और नई तकनीक के साथ बेहद प्रभावशाली तरीके से किया गया।इस आयोजन ने पासी समाज के कार्यक्रमों को नई पहचान दी!
2015 : दिल्ली और मुख्यधारा मीडिया
वर्ष 2015 में ही तालकटोरा स्टेडियम, दिल्ली में हुए उदा देवी पासी कार्यक्रम में पहली बार देश के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह शामिल हुए। इस कार्यक्रम में श्री लक्ष्मी प्रसाद रावत , मुंबई के श्री रमाशंकर भारती और उपेंद्र रावत जी जैसे साथियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हाल के वर्षों में यह पहली बार था कि केंद्र के इतने बड़े मंत्री रक्षा मंत्री पासी समाज के कार्यक्रम में शामिल हुए और यहीं से पासी समाज के इतिहास को मुख्यधारा मीडिया ने गंभीरता से नोटिस करना शुरू किया।
2022 : मुख्यमंत्री की उपस्थिति – मुंबई
वर्ष 2022 में मुंबई में श्री अजय पासी और उनके साथियों की अगुवाई में महाराजा बिजली पासी की जयंती में पहली बार किसी राज्य के मुख्यमंत्री शामिल हुए।महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री श्री एकनाथ शिंदे जी की उपस्थिति ने देश के सामने पासी इतिहास का एक मजबूत संदेश दिया।निसंदेह यह भी पासी समाज के इतिहास को लोगो के सामने रखने के लिए एक बड़ी सफलता थी!
मैं यहाँ एक ऐसे व्यक्ति का भी विशेष उल्लेख करना चाहूँगा, जिन्होंने पर्दे के पीछे रहकर इंटरनेट पर पासी इतिहास को फैलाने में बड़ी भूमिका निभाई —कुँवर प्रताप (लखनऊ)।उन्होंने विकिपीडिया जैसे वैश्विक प्लेटफ़ॉर्म पर पासी समाज के इतिहास को अपडेट किया।विकिपीडिया, जिसे पूरी दुनिया एक विश्वसनीय सूचना स्रोत मानती है, वहाँ पासी इतिहास को दर्ज कराना एक बड़ा योगदान था।इसके अलावा उन्होंने पासी समाज के इतिहास पर कई प्रभावशाली वीडियो भी बनाए, जिनसे इतिहास के प्रसार में मदद मिली।कुँवर प्रताप जैसे बहुत से लोग आज भी अपने अपने स्तर पर पर्दे के पीछे से काफ़ी कार्य कर रहे है जिनसे हम अनजान है !
यहाँ तक पहुँचने की यात्रा में कई प्रयास सफल हुए, तो कई असफल भी रहे होंगे! सबके बारे में जानकारी नहीं है पर मैं स्वयं दो ऐसे प्रयासों से जुड़ा रहा हूँ, जो यदि सफल होते, तो शायद आज परिस्थितियाँ और बेहतर होतीं।पहला प्रयास स्वर्गीय आर. के. सरोज जी (दारोगा) का था।वे पासी समाज के इतिहासकारों के साथ मिलकर नई पीढ़ी और नए तथ्यों के अनुसार एक बड़ी पासी समाज के इतिहास के बारे में किताब लिखवाना चाहते थे।साथ ही वे राजभर इतिहासकारों के साथ मिलकर राजभर-पासी विवाद को समाप्त करने का प्रयास कर रहे थे।दुर्भाग्यवश, उनके असमय निधन के कारण यह कार्य अधूरा रह गया।
दूसरा प्रयास लखनऊ के डॉ. यशवंत जी का था।उन्होंने इंग्लैंड जाकर पासी समाज के इतिहास की खोज के लिए एक टीम और योजना तैयार की थी।उद्देश्य यह था जैसे दाऊजी गुप्त ने उदा देवी का इतिहास इंग्लैंड से ले कर आए थे वैसे ही इंगलैंड जा कर अंग्रेज़ी दस्तावेज़ों और संग्रहालयों से पासी इतिहास के और प्रमाण सामने लाए जाएँ।कोशिश यह थी की कुछ पैसे इकट्ठा कर और कुछ मदद सरकार या राजनीतिक संगठनों से मिल जाय तो आगे बढ़े लेकिन यह योजना भी सफल नहीं हो सकी।
सारांश यही है कि पासी समाज और महाराजा बिजली पासी के इतिहास को यहाँ तक पहुँचाने में किसी एक व्यक्ति, संगठन, सरकार या नेता का नहीं,बल्कि पूरे पासी समाज के सामूहिक प्रयासों का योगदान है।आज के कुछ युवा केवल नेतृत्व या सोशल मीडिया रील्स तक सीमित होकर पुराने और वरिष्ठ साथियों के योगदान को भूल जाते हैं।यह समझना ज़रूरी है कि आज हम जहाँ खड़े हैं, वहाँ तक पहुँचने के लिए कई पीढ़ियों ने संघर्ष किया है।अंत में इतना ही कहना चाहूँगा कि आज पासी समाज के इतिहास को जो पहचान और स्वीकार्यता मिल रही है,वह निश्चित रूप से एक सकारात्मक संकेत है,लेकिन इसे मंज़िल मान लेना भूल होगी।यह अभी एक निरंतर चलने वाली यात्रा है अगला और ज़रूरी कदम होना चाहिए —पासी समाज के सांसदों और विधायकों की संख्या को और बढ़ाना, देश की शिक्षा व्यवस्था और पाठ्यक्रमों में पासी समाज के इतिहास को उचित स्थान दिलाना,और सबसे महत्वपूर्ण —पासी समाज की सभी उपजातियों के बीच मौजूद मतभेदों को समाप्त कर उन्हें एक सूत्र में बाँधकर एक संगठित और प्रभावशाली सामाजिक शक्ति के रूप में आगे बढ़ना।आज यह समझना बेहद ज़रूरी है कि हम जिस स्थान पर खड़े हैं, वहाँ तक पहुँचना किसी एक व्यक्ति,किसी एक संगठन या किसी एक सरकार का योगदान नहीं है।यह समाज के लोगों की लगातार मेहनत, धैर्य और प्रतिबद्धता का परिणाम है इसलिए ज़रूरत है —पुराने और वरिष्ठ साथियों के योगदान को याद रखने की, उनके अनुभवों से सीखने की,और नई पीढ़ी द्वारा उस संघर्ष को आगे बढ़ाने की।यही सोच पासी समाज के इतिहास को और अधिक मज़बूत, व्यापक और स्थायी बनाएगी।

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