परिवार परम्परा एवं बिखरते रिश्ते पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता -ः ललित गर्ग:-
परिवार केवल एक छत के नीचे रहने वाले लोगों का समूह नहीं, बल्कि विश्वास, त्याग, धैर्य और संस्कारों का जीवंत विद्यालय है। जब इस विद्यालय की नींव कमजोर होने लगती है तो उसका प्रभाव केवल एक घर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा समाज उसकी कीमत चुकाता है। देश के बहुचर्चित सोनम रघुवंशी ‘हनीमून मर्डर’ प्रकरण की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय की पीठ द्वारा व्यक्त की गई चिंता केवल एक अपराध पर की गई टिप्पणी नहीं थी, बल्कि भारतीय समाज के बदलते चरित्र का गहन सामाजिक विश्लेषण थी। न्यायमूर्ति एम. एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी. बी. वराले ने जिस पीड़ा के साथ कहा कि संयुक्त परिवार लोगों को धैर्य, संयम, सहनशीलता और समायोजन सिखाते थे, वहीं आज एकल परिवारों में अवसाद, असहिष्णुता और संबंधों का विघटन बढ़ रहा है, वह हमारे समय का कटु सत्य है।
माता-पिता और संतान, भाई-बहन, दादा-दादी और पोते-पोतियों के बीच भी भावनात्मक दूरी लगातार बढ़ रही है, यह परिवार परम्परा एवं रिश्तों में बढ़़ती दूरी अब पति-पत्नी के बीच भी बड़ी दरारें डालने लगी है। रिश्तों का खोखलापन इतना बढ़ गया है कि अपनी ही पत्नी या पति की हत्या करने में भी तनिक संकोच नहीं रहा। ऐसे घटनाएं बार-बार देखने को मिल रही है। घर बड़े हो गए हैं, लेकिन दिल छोटे होते जा रहे हैं। सुविधाएं बढ़ी हैं, परंतु संवेदनाएं सिकुड़ती जा रही हैं। संवाद कम हो गए हैं और स्क्रीन का समय बढ़ गया है। परिणामस्वरूप रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिकता में बदलते जा रहे हैं। हाल के वर्षों में विवाह से पहले अथवा विवाह के कुछ ही दिनों बाद हुई इन नृशंस हत्याओं ने पूरे देश को झकझोर दिया है। यह केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के पतन का संकेत है। जिन परिवारों में धन, प्रतिष्ठा और भौतिक सुख-सुविधाओं की कोई कमी नहीं थी, वहीं जीवन का सबसे बड़ा अभाव विश्वास और संतोष का था। संत कबीर का यह वचन आज पहले से अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है- ‘जब आए संतोष धन, सब धन धूरि समान।’ भौतिक संपन्नता कभी भी मानसिक शांति और रिश्तों की ऊष्मा नहीं खरीद सकती।
भारतीय संस्कृति ने परिवार को केवल सामाजिक संस्था नहीं माना, बल्कि धर्म, संस्कृति और जीवन-मूल्यों का प्रथम विद्यालय माना है। संयुक्त परिवार में दादा-दादी केवल बुजुर्ग नहीं होते थे, वे अनुभवों के विश्वविद्यालय होते थे। नाना-नानी केवल रिश्तेदार नहीं, बल्कि संस्कारों के संरक्षक होते थे। बच्चों को कहानियों के माध्यम से धैर्य, करुणा, क्षमा, संयम और त्याग का पाठ पढ़ाया जाता था। घर का हर सदस्य दूसरे के दुःख का सहभागी होता था। इसलिए किसी एक व्यक्ति का तनाव पूरे परिवार की शक्ति से हल्का हो जाता था। आज यह सुरक्षा-कवच तेजी से टूट रहा है। महत्वाकांक्षाओं की अंधी दौड़ में पति-पत्नी दोनों कार्यस्थल पर व्यस्त हैं। बच्चों का बचपन मोबाइल, टैबलेट और घरेलू सहायिकाओं के भरोसे बीत रहा है। जब बच्चा रोता है तो उसे गोद नहीं, मोबाइल थमा दिया जाता है। यह सुविधा का समाधान नहीं, संवेदनाओं का विस्थापन है। सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी कि ‘भावनाओं का विकल्प गैजेट्स नहीं हो सकते’, हमारे समय की सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक चेतावनी है।
डिजिटल क्रांति ने जीवन को सरल अवश्य बनाया है, लेकिन यदि तकनीक मनुष्य पर हावी हो जाए तो वह संबंधों की सबसे बड़ी शत्रु बन जाती है। आज परिवार एक ही कमरे में बैठकर भी अलग-अलग दुनिया में खोया रहता है। भोजन की मेज पर संवाद समाप्त हो गया है। आंखों में आंखें डालकर बातें करने की परंपरा लुप्त होती जा रही है। इससे भावनात्मक जुड़ाव कमजोर पड़ रहा है और अकेलापन बढ़ रहा है। इस पूरे संकट की जड़ केवल आधुनिकता नहीं है। समस्या आधुनिकता के असंतुलित और अंधानुकरण में है। पश्चिम से हमने तकनीक तो अपनाई, लेकिन उसकी सामाजिक चुनौतियों से सीख नहीं ली। अब पति और पत्नी के बीच तीसरा आना आम बात हो गयी है, और यही तीसरा समस्या की जड़ है। इस तरह के अवैध रिश्तों ने त्रासद घटनाओं को जन्म दिया है।
भारतीय परिवार व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता थी-‘मैं’ से पहले ‘हम’ का भाव। आज ‘हम’ की जगह ‘मैं’ ने ले ली है। अधिकारों की चर्चा तो बहुत होती है, लेकिन कर्तव्यों का स्मरण बहुत कम होता है। रिश्तों में बढ़ता अहंकार भी विघटन का बड़ा कारण है। पति-पत्नी दोनों अपने-अपने तर्कों को अंतिम सत्य मानने लगे हैं। कोई झुकना नहीं चाहता। जबकि भारतीय परंपरा ने सिखाया था कि झुकना हार नहीं, बल्कि संबंधों को बचाने की सबसे बड़ी जीत है। क्षमा और संवाद हर टूटते रिश्ते की पहली दवा हैं, किंतु आज संवाद की जगह आरोप और क्षमा की जगह प्रतिशोध ने ले ली है। यह भी विचारणीय है कि आज विवाह को जीवनभर का संस्कार नहीं, बल्कि सुविधानुसार निभाया जाने वाला अनुबंध समझा जाने लगा है। यही कारण है कि छोटी-छोटी असहमतियां भी अदालतों तक पहुंच रही हैं। न्यायालय न्याय दे सकता है, लेकिन प्रेम नहीं लौटा सकता। कानून अधिकारों का संरक्षण कर सकता है, लेकिन आत्मीयता का निर्माण नहीं कर सकता। इसलिए पारिवारिक समस्याओं का स्थायी समाधान न्यायालयों में नहीं, परिवारों के भीतर ही खोजा जाना चाहिए।
भारत आज विश्वगुरु बनने का स्वप्न देख रहा है। आर्थिक प्रगति, वैज्ञानिक उपलब्धियां, डिजिटल नवाचार और वैश्विक नेतृत्व निश्चित रूप से गर्व के विषय हैं। लेकिन यदि हमारी सबसे बड़ी सांस्कृतिक शक्ति ‘संयुक्त परिवार’ कमजोर हो जाएगी, तो यह प्रगति अधूरी रह जाएगी। विश्व भारत से केवल आर्थिक शक्ति की अपेक्षा नहीं करता, बल्कि उन जीवन-मूल्यों की भी अपेक्षा करता है जिन्होंने हजारों वर्षों तक इस सभ्यता को जीवित रखा है। विश्वगुरु वही बन सकता है जो अपने परिवारों को भी मजबूत रख सके। जिस समाज में माता-पिता उपेक्षित हों, बुजुर्ग अकेले हों, बच्चे भावनात्मक रूप से असुरक्षित हों और पति-पत्नी विश्वास के संकट से जूझ रहे हों, वह केवल आर्थिक महाशक्ति बन सकता है, सांस्कृतिक महाशक्ति नहीं।
समय आ गया है कि परिवारों में पुनः संवाद की संस्कृति विकसित की जाए। सप्ताह में कुछ समय ऐसा हो जब पूरा परिवार बिना मोबाइल के साथ बैठे। बच्चों को केवल अच्छी शिक्षा ही नहीं, अच्छे संस्कार भी मिलें। विद्यालयों में जीवन-मूल्य और भावनात्मक शिक्षा को महत्व दिया जाए। विवाह-पूर्व परामर्श, पारिवारिक परामर्श और मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को सामाजिक आंदोलन का रूप दिया जाए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि परिवार में बुजुर्गों की भूमिका को पुनः सम्मानपूर्वक स्थापित किया जाए, क्योंकि वे केवल अतीत के प्रतीक नहीं, बल्कि भविष्य के मार्गदर्शक हैं। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी किसी न्यायिक टिप्पणी भर नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी का शंखनाद है। यदि हमने अभी भी अपने परिवारों को बचाने का प्रयास नहीं किया तो आने वाले वर्षों में केवल अदालतों में मुकदमे नहीं बढ़ेंगे, बल्कि समाज की संवेदनाएं भी समाप्त होती जाएंगी।
भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है- ‘वसुधैव कुटुम्बकम्।’ लेकिन जो समाज अपने ही परिवार को नहीं बचा पाएगा, वह पूरी दुनिया को परिवार कैसे मान सकेगा? आज आवश्यकता नई इमारतें बनाने की नहीं, बल्कि बिखरते घरों को जोड़ने की है। नई तकनीक विकसित करने की नहीं, बल्कि टूटते संवादों को पुनर्जीवित करने की है। नई पीढ़ी को केवल सफल बनाने की नहीं, बल्कि संवेदनशील बनाने की है। यदि भारत को सचमुच विश्वगुरु बनना है, तो उसकी शुरुआत संसद, न्यायालय या विश्वविद्यालयों से नहीं, बल्कि हर घर के आंगन से होगी। संयुक्त परिवार की आत्मा, रिश्तों की गरिमा, संवाद की संस्कृति और संस्कारों की विरासत को पुनर्जीवित करना ही इस युग की सबसे बड़ी राष्ट्रीय आवश्यकता है। यही सुप्रीम कोर्ट की चिंता का वास्तविक संदेश है और यही भारतीय सभ्यता के भविष्य की सबसे बड़ी आशा भी।

चातुर्मास द्वार है आत्मोन्नति और जीवन-परिवर्तन का -स्वामी देवेन्द्र ब्रह्मचारी –
संवाद से सशक्त होगा लोकतंत्र, हिंसा से नहीं -ः ललित गर्ग:-
राष्ट्रीय ध्वज राष्ट्र की अखंडता का अमर प्रतीक:- ललित गर्ग
विक्रम-1ः नए भारत की अंतरिक्ष उड़ान का स्वर्णिम अध्याय – ललित गर्ग –
संघ की जीवंत परम्परा की सूरत सत्य के आईने में -ः ललित गर्ग:-
मंदिरों में भ्रष्टाचारः वहां सुशासन की नई क्रांति का सूत्रपात हो -ः ललित गर्ग:- 