विकसित भारत की राह में जनसंख्या संतुलन का प्रश्न -ः ललित गर्ग:-
प्रतिवर्ष 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 की थीम है- ‘‘युवाओं की उम्मीदों और आकांक्षाओं को साकार करना-आज और भविष्य के लिए।’’ यह विषय स्पष्ट संकेत देता है कि किसी भी राष्ट्र का भविष्य केवल उसकी जनसंख्या के आकार से नहीं, बल्कि उस जनसंख्या की गुणवत्ता, शिक्षा, स्वास्थ्य, कौशल और अवसरों से निर्धारित होता है। भारत विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। यह स्थिति एक ओर विशाल मानव संसाधन का अवसर प्रस्तुत करती है, तो दूसरी ओर संसाधनों, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और पर्यावरण पर अभूतपूर्व दबाव भी उत्पन्न करती है। इसलिए विश्व जनसंख्या दिवस भारत के लिए केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि गंभीर आत्ममंथन का अवसर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनेक अवसरों पर छोटे परिवार के महत्व पर बल देते हुए कहा है कि जो परिवार स्वेच्छा से परिवार नियोजन अपनाते हैं, वे राष्ट्र-निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। उनका यह संदेश बताता है कि जनसंख्या संतुलन किसी एक समुदाय का नहीं, बल्कि पूरे देश के सतत विकास का विषय है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विभिन्न पदाधिकारियों ने भी समय-समय पर यह कहा है कि जनसंख्या नीति सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए तथा इसका उद्देश्य किसी समुदाय को लक्ष्य बनाना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित, संसाधनों के संतुलित उपयोग और सामाजिक समरसता को सुनिश्चित करना होना चाहिए।
भारत आज वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है। ‘‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’’ का मंत्र तभी पूरी तरह साकार हो सकता है, जब विकास की गति और जनसंख्या वृद्धि के बीच संतुलन स्थापित हो। यदि जनसंख्या अनियंत्रित गति से बढ़ती रहे और संसाधनों का विस्तार उसी अनुपात में न हो, तो विकास की उपलब्धियां भी पर्याप्त सिद्ध नहीं होंगी। रोजगार के अवसर सीमित होंगे, कृषि योग्य भूमि सिकुड़ेगी, जल संकट गहराएगा, महानगरों पर दबाव बढ़ेगा और पर्यावरणीय असंतुलन गंभीर होता जाएगा। हालांकि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि जनसंख्या संबंधी विमर्श तथ्यों, संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक सद्भाव पर आधारित हो। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार देता है और जनसंख्या नीति का उद्देश्य भी समान रूप से सभी नागरिकों पर लागू होने वाला, न्यायसंगत एवं पारदर्शी ढांचा होना चाहिए। परिवार नियोजन, महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता, विवाह की उपयुक्त आयु, आर्थिक सशक्तिकरण तथा जन-जागरूकता ऐसे उपाय हैं, जिनसे बिना किसी भेदभाव के जनसंख्या स्थिरीकरण की दिशा में प्रभावी परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। विश्व के अनेक अनुभव बताते हैं कि जैसे-जैसे शिक्षा, विशेषकर महिला शिक्षा और आर्थिक विकास बढ़ता है, वैसे-वैसे प्रजनन दर स्वाभाविक रूप से घटती है।
भारत के सामने एक अन्य गंभीर चुनौती अवैध घुसपैठ की भी है। सीमावर्ती क्षेत्रों में यदि अवैध रूप से लोगों का प्रवेश होता है और वे बिना वैधानिक प्रक्रिया के देश में बस जाते हैं, तो इससे राष्ट्रीय सुरक्षा, संसाधनों के वितरण तथा जनसांख्यिकीय संतुलन पर प्रभाव पड़ सकता है। यह विषय जनसंख्या नियंत्रण से अलग, कानून व्यवस्था और सीमा सुरक्षा का प्रश्न है। अतः सीमा प्रबंधन को सुदृढ़ बनाना, अवैध प्रवासन पर प्रभावी नियंत्रण रखना तथा नागरिकता संबंधी कानूनों का निष्पक्ष पालन सुनिश्चित करना आवश्यक है। यह मुद्दा किसी धर्म या समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि कानून के शासन और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा विषय है। भारत को यह भी समझना होगा कि केवल कठोर कानून बना देना पर्याप्त नहीं होगा। चीन ने अपने समय में एक-संतान नीति अपनाई, लेकिन बाद में बदलती परिस्थितियों के कारण उसे वापस लेना पड़ा। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था चीन से भिन्न है। इसलिए भारत के लिए अधिक उपयुक्त मार्ग वह होगा जिसमें कानून के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता, स्वैच्छिक सहभागिता, शिक्षा और सकारात्मक प्रोत्साहन को प्राथमिकता दी जाए। छोटे परिवारों को प्रोत्साहन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार, महिलाओं की आर्थिक भागीदारी और युवाओं के कौशल विकास पर विशेष ध्यान देना अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकता है।
पिछले एक वर्ष के आंकड़े बताते हैं कि विश्व की जनसंख्या लगभग 8.19 अरब से बढ़कर 8.30 अरब हो गई है, अर्थात एक वर्ष में लगभग 6.9 करोड़ लोगों की वृद्धि हुई है, जो लगभग 0.83 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर को दर्शाती है। दूसरी ओर भारत की जनसंख्या 1.45 अरब से बढ़कर लगभग 1.47 अरब हो गई है, यानी एक वर्ष में लगभग 1.25 करोड़ लोग और जुड़ गए। भारत की जनसंख्या वृद्धि दर 0.87-0.89 प्रतिशत के बीच है, जो वैश्विक औसत से थोड़ी अधिक है। भारत विश्व की कुल आबादी का लगभग 17.8 प्रतिशत हिस्सा रखता है। इतनी विशाल जनसंख्या के कारण शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आवास, जल, ऊर्जा, कृषि भूमि और पर्यावरण पर दबाव लगातार बढ़ रहा है। यदि जनसंख्या वृद्धि और विकास के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो विकसित भारत का लक्ष्य अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाएगा। इसलिए केवल आर्थिक विकास पर्याप्त नहीं है, बल्कि जनसंख्या स्थिरीकरण, मानव संसाधन विकास और संसाधनों के संतुलित नियोजन को भी समान प्राथमिकता देनी होगी।
भारत में जनसंख्या का प्रश्न केवल सामाजिक या आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श का भी विषय बन गया है। जातिगत जनगणना और विभिन्न जाति-समुदायों की जनसंख्या को लेकर राजनीतिक दल अक्सर अपने-अपने वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति अपनाते दिखाई देते हैं। अनेक विश्लेषकों का मानना है कि यदि जनसंख्या के आंकड़ों का उपयोग केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण या चुनावी लाभ के लिए किया जाएगा, तो यह राष्ट्रीय एकता और समावेशी विकास की भावना के विपरीत होगा। इसके विपरीत, चीन ने अपनी परिस्थितियों के अनुरूप लंबे समय तक कठोर जनसंख्या नियंत्रण नीति अपनाकर जनसंख्या वृद्धि पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित किया, यद्यपि बाद में बदलती जनसांख्यिकीय चुनौतियों के कारण उसने उस नीति में संशोधन भी किया। भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था अलग है, इसलिए यहां समाधान कठोर दमनात्मक उपायों के बजाय समान रूप से लागू होने वाली जनसंख्या नीति, महिला शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार, परिवार नियोजन, जन-जागरूकता और कानून के निष्पक्ष अनुपालन में निहित है। जनसंख्या के प्रश्न को जाति, धर्म या वोट बैंक की राजनीति से ऊपर उठाकर राष्ट्रीय विकास, सामाजिक संतुलन और भविष्य की पीढ़ियों के हित के दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।
विश्व जनसंख्या दिवस 2026 की थीम भी इसी दिशा में संकेत करती है कि यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और अवसर मिलेंगे, तो वे स्वयं जिम्मेदार नागरिक बनकर संतुलित परिवार और सतत विकास की दिशा में योगदान देंगे। भारत की लगभग आधी आबादी युवा है। यह जनसांख्यिकीय लाभांश तभी राष्ट्र की शक्ति बनेगा, जब यह शिक्षित, कुशल, स्वस्थ और आत्मनिर्भर होगा। अन्यथा यही विशाल युवा आबादी बेरोजगारी, असंतोष और सामाजिक चुनौतियों का कारण भी बन सकती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि देश में एक व्यापक, वैज्ञानिक और सर्वसम्मत राष्ट्रीय जनसंख्या नीति पर गंभीर विचार किया जाए। ऐसी नीति में समानता, पारदर्शिता, संवैधानिक मूल्यों और राष्ट्रीय हित को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले। इसके साथ ही जनसंख्या संबंधी किसी भी चर्चा में सामाजिक सौहार्द, तथ्यपरक विश्लेषण और जिम्मेदार सार्वजनिक विमर्श बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। किसी भी प्रकार की अतिरंजना या विभाजनकारी दृष्टिकोण समाधान नहीं, बल्कि नई समस्याओं को जन्म दे सकता है।
विश्व जनसंख्या दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि विकसित भारत का सपना केवल आर्थिक विकास से पूरा नहीं होगा। इसके लिए जनसंख्या और संसाधनों के बीच संतुलन, मानव पूंजी में निवेश, महिलाओं का सशक्तिकरण, युवाओं को अवसर, प्रभावी सीमा प्रबंधन और दीर्घकालिक राष्ट्रीय नीति-इन सभी का समन्वित प्रयास आवश्यक है। यदि भारत समय रहते जनसंख्या संतुलन, मानव विकास और संसाधनों के न्यायसंगत उपयोग की दिशा में ठोस कदम उठाता है, तो वर्ष 2047 तक विकसित, समृद्ध, आत्मनिर्भर और सशक्त भारत का लक्ष्य अधिक यथार्थ रूप में साकार हो सकेगा। जनसंख्या केवल संख्या नहीं, बल्कि राष्ट्र की शक्ति है, बशर्ते वह शिक्षित, स्वस्थ, अनुशासित, उत्पादक और संतुलित हो। यही विश्व जनसंख्या दिवस का वास्तविक संदेश है।

हिंद-प्रशांत में भारत का बढ़ता सामर्थ्य एवं साझेदारियां -ः ललित गर्ग:-
मिलावट है भारत के सपनों पर विषनुमा दाग – ललित गर्ग –
डिजिटल क्रांति के दौर में बढ़ते साइबर अपराध, बड़ी चुनौती -ः ललित गर्ग:-
विकास की धंसती सड़कें और भ्रष्टाचार की गहरी नींवें -ः ललित गर्ग:-
नए भारत के शिल्पकार डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी -ः ललित गर्ग:-
प्लास्टिक बैग से जकड़ी जीवन-शैली से पर्यावरण तबाह -ः ललित गर्ग:- 