ब्रिक्स संसदीय मंच है शांति और न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था का संकल्प -ः ललित गर्ग:-
आज जब दुनिया युद्धों, क्षेत्रीय संघर्षों, आर्थिक अस्थिरता, आतंकवाद, व्यापारिक तनाव और जलवायु परिवर्तन जैसी गंभीर चुनौतियों से घिरी हुई है, तब अंतरराष्ट्रीय सहयोग की सार्थकता केवल कूटनीतिक घोषणाओं में नहीं, बल्कि आम आदमी के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में निहित है। ऐसे समय में 26-27 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के संविधान सदन में आयोजित 12वां ब्रिक्स संसदीय मंच वैश्विक लोकतांत्रिक संवाद, जन-केंद्रित विकास और बहुपक्षीय सहयोग की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण अवसर बनकर सामने आया है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित यह सम्मेलन इस विश्वास को सुदृढ़ करता है कि दुनिया की समस्याओं का स्थायी समाधान टकराव, वर्चस्व और संकीर्ण राष्ट्रीय हितों में नहीं, बल्कि संवाद, सहमति और साझा जिम्मेदारी में निहित है। इस संसदीय मंच का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश है कि विकास का वास्तविक उद्देश्य केवल आर्थिक समृद्धि नहीं, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में सम्मान, सुरक्षा, अवसर और खुशहाली सुनिश्चित करना है। सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि, तकनीकी प्रगति, व्यापार का विस्तार और बुनियादी ढाँचे का विकास तभी सार्थक हैं, जब उनका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे। विकास की चमक के बीच यदि गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, असमानता और सामाजिक वंचना बनी रहती है, तो प्रगति का दावा अधूरा है। इसलिए जन-केंद्रित विकास की अवधारणा आज वैश्विक नीतियों की अनिवार्य कसौटी बननी चाहिए।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का संसदीय संवाद, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनहित को प्राथमिकता देने पर बल इसी दृष्टि से विशेष प्रासंगिकता रखता है। संसद लोकतंत्र की आत्मा है। वह केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं, पीड़ाओं, अधिकारों और अपेक्षाओं की प्रतिनिधि है। सांसदों का दायित्व सरकारों के निर्णयों का समर्थन करना भर नहीं, बल्कि उनकी समीक्षा करना, जनहित के प्रश्न उठाना और सत्ता को जवाबदेह बनाए रखना भी है। जब विभिन्न देशों के निर्वाचित प्रतिनिधि एक मंच पर बैठकर अनुभवों और विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, तब संसदीय लोकतंत्र की शक्ति राष्ट्रीय सीमाओं से आगे बढ़कर वैश्विक कल्याण का माध्यम बन सकती है। इस मंच की प्रासंगिकता इसलिए भी बढ़ जाती है कि वर्तमान विश्व व्यवस्था अनेक विरोधाभासों से जूझ रही है। एक ओर विज्ञान, संचार और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने मानव जीवन को अभूतपूर्व क्षमताएँ प्रदान की हैं, वहीं दूसरी ओर युद्धों, अविश्वास, हथियारों की प्रतिस्पर्धा और आर्थिक विषमताओं ने मानवता के भविष्य को अनिश्चित बनाया है। ऐसे वातावरण में सांसदों का साझा दायित्व है कि वे अपने-अपने देशों की नीतियों को मानवीय संवेदनाओं, शांति और न्याय के व्यापक उद्देश्यों से जोड़ें। संसदों के बीच संवाद कार्यपालिका की कूटनीति को जनप्रतिनिधियों के अनुभवों से समृद्ध करता है और अंतरराष्ट्रीय निर्णयों में पारदर्शिता तथा लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को प्रोत्साहित करता है।
ब्रिक्स संसदीय मंच के चार प्रमुख आधार-संस्थागत लचीलापन, नवाचार, सहयोग और सतत विकास-भविष्य की वैश्विक राजनीति के लिए विशेष महत्त्व रखते हैं। संस्थागत लचीलापन लोकतांत्रिक संस्थाओं को संकटों के बीच भी सक्षम और उत्तरदायी बनाएगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक के उपयोग में नैतिकता, पारदर्शिता तथा मानवीय हितों की रक्षा आवश्यक है, ताकि तकनीक सुविधा का माध्यम बने, असमानता और नियंत्रण का नहीं। इसी प्रकार सतत विकास का अर्थ आर्थिक प्रगति और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना है। जलवायु संकट का सामना कोई देश अकेले नहीं कर सकता, इसके लिए संसाधनों, ज्ञान और उत्तरदायित्व का न्यायपूर्ण बँटवारा जरूरी है। इस सम्मेलन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष ग्लोबल साउथ अर्थात विकासशील देशों की आवाज को अंतरराष्ट्रीय निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रभावशाली बनाना है। विश्व की बड़ी आबादी इन देशों में निवास करती है, लेकिन वैश्विक वित्तीय व्यवस्था, व्यापारिक नियमों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में उनकी अपेक्षाओं को हमेशा पर्याप्त स्थान नहीं मिला है। खाद्य सुरक्षा, उर्वरक उपलब्धता, ऊर्जा की सुलभता, ऋण का बोझ और विकास के लिए वित्तीय संसाधनों की कमी जैसी समस्याएँ करोड़ों लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं। ऐसे में ब्रिक्स देशों के सांसदों को यह सुनिश्चित करने का प्रयास करना चाहिए कि वैश्विक नीतियाँ शक्तिशाली देशों के हितों तक सीमित न रहें, बल्कि विकासशील समाजों की वास्तविक आवश्यकताओं को भी प्रतिबिंबित करें। भारत की भूमिका इस संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भारत अपनी लोकतांत्रिक परंपराओं, विविधतापूर्ण सामाजिक संरचना, विकास संबंधी अनुभवों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग की नीति के माध्यम से विभिन्न देशों के बीच संवाद का सेतु बन सकता है। भारत की शक्ति केवल उसकी आर्थिक क्षमता या जनसंख्या में नहीं, बल्कि विविधताओं को साथ लेकर चलने और मतभेदों के बीच सहमति खोजने की लोकतांत्रिक क्षमता में भी निहित है। नई दिल्ली में इस मंच का आयोजन भारतीय संसदीय कूटनीति को नई ऊर्जा प्रदान करता है।
भारत का प्रयास होना चाहिए कि ब्रिक्स सहयोग किसी एक देश के वर्चस्व का साधन न बने, बल्कि सभी सदस्य और साझेदार देशों के साझा हितों का मंच बने। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने अपने उद्घाटन संबोधन में इस बात पर विशेष बल दिया कि ब्रिक्स की वास्तविक सफलता संवाद को ठोस परिणामों में बदलने से मापी जाएगी। उन्होंने युवाओं की आकांक्षाओं को अवसरों से जोड़ने तथा विकास और पर्यावरण संरक्षण को परस्पर पूरक बनाने की आवश्यकता भी रेखांकित की। इन विचारों में भविष्य की दिशा छिपी है। दुनिया की युवा आबादी को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, रोजगार और नवाचार के अवसर उपलब्ध कराना केवल राष्ट्रीय सरकारों का दायित्व नहीं, बल्कि वैश्विक सहयोग का भी विषय है। यदि युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा नहीं मिलेगी, तो निराशा और असमानता सामाजिक अस्थिरता को जन्म दे सकती हैं। इसी तरह आतंकवाद के विरुद्ध साझा रणनीति, अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान और संयुक्त राष्ट्र जैसी वैश्विक संस्थाओं में सुधार आज की अपरिहार्य जरूरतें हैं। भारत ने आतंकवाद के विरुद्ध सहयोग और अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण वैश्विक शासन व्यवस्था की आवश्यकता को संसदीय संवाद के महत्त्वपूर्ण विषयों के रूप में उठाया है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की विश्वसनीयता तभी बढ़ेगी, जब वे सभी देशों के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करें और संकटों के समाधान में प्रभावी भूमिका निभाएँ। शांति का अर्थ केवल युद्ध का अभाव नहीं, बल्कि भयमुक्त जीवन, न्यायपूर्ण अवसर और मानवीय गरिमा की सुरक्षा भी है।
अंततः 12वें ब्रिक्स संसदीय मंच का वास्तविक महत्त्व इस बात में निहित है कि वह दुनिया के सांसदों को उनकी मूल जिम्मेदारी का स्मरण कराता है-वे केवल अपने देशों की सीमाओं के भीतर जनता के प्रतिनिधि नहीं, बल्कि साझा मानव भविष्य के निर्माण में भागीदार भी हैं। संविधान सदन से उठने वाला संदेश स्पष्ट है कि लोकतंत्र की सार्थकता जनता के विश्वास, संस्थाओं की जवाबदेही और नीतियों के मानवीय परिणामों में है। यह सम्मेलन तभी ऐतिहासिक सिद्ध होगा, जब इसके विचार ठोस नीतियों, प्रभावी कानूनों और जनजीवन में दिखाई देने वाले परिवर्तनों का रूप लेंगे। दुनिया को आज केवल शक्तिशाली राष्ट्रों की नहीं, बल्कि संवेदनशील नेतृत्व, उत्तरदायी संसदों और मानवीय दृष्टि से प्रेरित नीतियों की आवश्यकता है। भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स संसदीय मंच इसी दिशा में आशा जगाता है कि संवाद संघर्षों को कम कर सकता है, सहयोग विषमताओं को घटा सकता है और लोकतंत्र विकास को मानवीय बना सकता है। यही इस सम्मेलन का संदेश है, यही इसकी प्रासंगिकता और यही एक शांतिपूर्ण, समावेशी तथा न्यायपूर्ण विश्व व्यवस्था की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

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