नारी-आरक्षणः नये भारत का आधार एवं संभावनाओं का शिखर -ललित गर्ग-
नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर भारत की राजनीति और समाज में जो नई चेतना उभरकर सामने आई है, वह केवल एक विधायी परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक रूपांतरण एवं नये भारत-निर्माण की संभावनाओं की प्रस्तावना है। निश्चिततौर पर भारत अब अपने विकास की धुरी में महिलाओं की सक्रिय और निर्णायक भागीदारी को अनिवार्य मानने लगा है। दशकों से लंबित महिला आरक्षण का मुद्दा केवल संसद के गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भारतीय समाज की उस अंतर्धारा से जुड़ा रहा है, जिसमें बराबरी, सम्मान और अवसर की मांग निरंतर उठती रही है। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित करने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह सही कहा कि यह इस सदी के महत्वपूर्ण कदमों में से एक है। पहले यह अधिनियम नई जनगणना के बाद लागू होना था, पर उसमें देरी के चलते सरकार ने इसे 2011 की जनगणना के आधार पर लागू करने का निर्णय किया। इस पर विपक्षी दलों ने आपत्ति जताई है, पर इस आपत्ति को महत्व देने से अगले लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू करना संभव नहीं होगा, क्योंकि ताजा जनगणना के आंकड़ों के आधार पर बनने वाले परिसीमन आयोग की रिपोर्ट आने में समय लगता और तब तक 2029 के आम चुनाव हो जाते। इसी कारण इस अधिनियम में संशोधन करने हेतु संसद का एक विशेष सत्र बुलाया गया है। चूंकि यह सत्र विधानसभा चुनावों के बीच बुलाया जा रहा है, इसलिए भी कई विपक्षी दलों को यह कांटों की तरह चुभन दे रहा है।
भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी का इतिहास विरोधाभासों से भरा रहा है। एक ओर देश ने इंदिरा गांधी जैसी सशक्त महिला नेतृत्व को देखा, वहीं दूसरी ओर संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या लंबे समय तक सीमित बनी रही। वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी लगभग 15 प्रतिशत के आसपास है, जो यह बताती है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर अभी भी एक बड़ा अंतर विद्यमान है। इस संदर्भ में महिला आरक्षण अधिनियम उस अंतर को पाटने का एक संगठित और संरचनात्मक प्रयास है। महत्वपूर्ण यह भी है कि इस अधिनियम को लागू करने के संदर्भ में जनगणना और परिसीमन को लेकर जो विवाद सामने आया है, वह भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं को भी उजागर करता है। सरकार द्वारा 2011 की जनगणना के आधार पर इसे लागू करने का निर्णय एक व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, क्योंकि नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया में होने वाली देरी महिला आरक्षण को वर्षों तक टाल सकती थी। विपक्ष की आशंकाएं अपनी जगह पर हैं, परंतु अभी तक उनके समर्थन में ठोस तथ्य सामने नहीं आए हैं।
भारतीय राजनीति में किसी भी बड़े निर्णय को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने की परंपरा रही है और महिला आरक्षण भी इससे अछूता नहीं है। विपक्ष द्वारा यह आरोप लगाना कि सरकार इस पहल के माध्यम से राजनीतिक लाभ लेना चाहती है, लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है। किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि लोकतंत्र में लिए जाने वाले अधिकांश निर्णयों के पीछे राजनीतिक गणित काम करता है। प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि निर्णय के पीछे राजनीतिक लाभ है या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि उसका प्रभाव समाज पर कितना सकारात्मक पड़ता है। यदि महिला आरक्षण से महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है और नीति निर्माण में उनका दृष्टिकोण शामिल होता है, तो यह संपूर्ण समाज के लिए लाभकारी होगा। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका में एक उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। महिलाएं अब केवल मतदाता नहीं रहीं, बल्कि वे एक निर्णायक मतदाता वर्ग के रूप में उभरी हैं। 2019 के आम चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों के लगभग बराबर रही और कई राज्यों में उन्होंने पुरुषों से अधिक मतदान किया। यह परिवर्तन केवल संख्या का नहीं, बल्कि चेतना का संकेत है। महिलाएं अब अपने अधिकारों और हितों के प्रति अधिक सजग हो रही हैं और राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं।
सरकारी योजनाओं ने भी इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उज्ज्वला योजना के माध्यम से रसोई गैस की उपलब्धता, जनधन योजना के तहत बैंकिंग सुविधा, स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत शौचालय निर्माण और मातृत्व लाभ योजनाओं ने महिलाओं के जीवन में प्रत्यक्ष सुधार किया है। इन योजनाओं का प्रभाव केवल आर्थिक या भौतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी रहा है, जिससे महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है और वे सार्वजनिक जीवन में अधिक सक्रिय हुई हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को इस संदर्भ में विशेष रूप से स्मरण किया जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय संविधान के माध्यम से समानता और न्याय के सिद्धांतों को स्थापित करते हुए महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। उनका यह विश्वास था कि किसी भी समाज की प्रगति का आकलन वहां की महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता है। आज जब महिला आरक्षण की बात हो रही है, तो यह उसी विचारधारा का विस्तार प्रतीत होता है, जिसमें महिलाओं को केवल संरक्षण नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का अवसर प्रदान किया जाता है।
हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि महिला आरक्षण अपने आप में कोई अंतिम समाधान नहीं है। यह एक आवश्यक कदम है, परंतु पर्याप्त नहीं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ने से महिलाओं की आवाज अवश्य मजबूत होगी, परंतु सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्तर पर समानता स्थापित करने के लिए और भी प्रयास करने होंगे। आज भी भारत में महिला श्रम भागीदारी दर लगभग 25 प्रतिशत के आसपास है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है। शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति हुई है, परंतु उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को और बढ़ाने की आवश्यकता है। महिला आरक्षण के क्रियान्वयन के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। यह आशंका व्यक्त की जाती रही है कि कई स्थानों पर महिलाएं केवल नाममात्र की प्रतिनिधि बनकर रह जाएंगी और वास्तविक निर्णय उनके पुरुष परिजन लेंगे। पंचायत स्तर पर इस तरह के उदाहरण देखने को मिले हैं, परंतु समय के साथ महिलाओं ने इस स्थिति को बदला भी है और अपने अधिकारों को स्वयं संभालने की क्षमता विकसित की है। इसी प्रकार राजनीतिक प्रशिक्षण और नेतृत्व विकास की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण है, ताकि महिलाएं केवल प्रतिनिधि न होकर प्रभावी नीति निर्माता बन सकें। इसके साथ ही राजनीतिक दलों की आंतरिक संरचना में भी परिवर्तन आवश्यक है। यदि दल अपने संगठनात्मक ढांचे में महिलाओं को पर्याप्त स्थान नहीं देंगे, तो केवल आरक्षण के माध्यम से वास्तविक सशक्तिकरण संभव नहीं होगा। दलों को चाहिए कि वे महिलाओं को नेतृत्व के अवसर प्रदान करें, उन्हें चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करें और उनके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करें।
नया भारत जिस विकसित राष्ट्र की कल्पना कर रहा है, उसमें नारी शक्ति की भूमिका केंद्रीय है। आज भारतीय महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। विज्ञान, तकनीक, खेल, शिक्षा, प्रशासन और उद्यमिता-हर क्षेत्र में उनकी उपलब्धियां यह प्रमाणित करती हैं कि अवसर मिलने पर वे किसी भी चुनौती का सामना कर सकती हैं। इसरो की महिला वैज्ञानिकों की सफलता, ओलंपिक में पदक जीतने वाली खिलाड़ियों का प्रदर्शन, और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण के उदाहरण इस परिवर्तन के सशक्त प्रमाण हैं। इस अधिनियम के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि विकास का कोई भी मॉडल तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक उसमें आधी आबादी की समान भागीदारी सुनिश्चित न हो। हालांकि इसके क्रियान्वयन में राजनीतिक मतभेद और व्यावहारिक चुनौतियां सामने आती रहेंगी, परंतु इसकी मूल भावना पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि इसे एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन के अवसर के रूप में देखा जाए। यदि सरकार, विपक्ष और समाज मिलकर इस दिशा में कार्य करते हैं, तो यह अधिनियम न केवल महिलाओं के लिए, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए एक नई दिशा निर्धारित कर सकता है। यही वह मार्ग है, जिस पर चलते हुए भारत एक सशक्त, समावेशी और विकसित राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान को और अधिक मजबूत कर सकता है।

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