डराने लगी है ऑनलाइन गेमिंग की लत एवं आभासी दुनिया -ः ललित गर्ग-
ऑनलाइन गेमिंग की लत एवं आभासी दुनिया कितनी भयावह एवं घातक हो सकती है, इसकी एक ही दिन में दो अलग-अलग जगह घटी घटनाओं ने न केवल झकझोरा है, बल्कि यह हमारे समय, हमारी सामाजिक संरचना और हमारी सामूहिक असावधानी पर लगा हुआ एक गहरा प्रश्नचिह्न बना है। धीरे-धीरे किशोरवय को अपने चपेट में लेने वाली यह प्रवृत्ति कितनी हृदयविदारक हो सकती है, उसका उदाहरण बुधवार को घटी ये दो भयावह घटनाएं हैं। एक हृदयविदारक घटना में गाजियाबाद की तीन अल्पवयस्क बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना में 12, 14 और 16 साल की तीन सुकोमल बहनें असमय काल-कवलित हो गईं। ऑनलाइन कोरियन गेम की दीवानी बहनें कोरिया में जाकर बसने और वहीं नया जीवन शुरू करने का सपना देखती थीं। घर वालों ने जब उनकी ऑनलाइन सनक से परेशान होकर उनसे मोबाइल छीन लिए, तो वे तनाव व अवसाद में घिर गई। फिर तीनों बहनों ने नौवीं मंजिल से कूदकर आत्महत्या कर ली। ऐसी ही घटना हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में भी घटी जहां एक पंद्रह वर्षीय किशोर ने ऑनलाइन गेम के अपने एक विदेशी साथी के बिछुड़ने के गम में घर में आत्महत्या कर ली। किशोर दसवीं का छात्र था। इन घटनाओें ने समाज को स्तब्ध ही नहीं किया, बल्कि भीतर तक गहरा घाव दिया है। यह कोई आकस्मिक या अलग-थलग घटना नहीं है। इससे पहले झाबुआ, भोपाल और देश के अन्य हिस्सों में सामने आई ऐसी घटनाएं यह संकेत देती हैं कि आभासी दुनिया किस तरह वास्तविक जीवन पर हावी होती जा रही है और हम अनजाने में एक ऐसे समाज का निर्माण कर रहे हैं जहां संवेदनाएं, संवाद और जीवन-मूल्य स्क्रीन के पीछे दम तोड़ते जा रहे हैं।
ऑनलाइन गेमिंग अपने आप में अपराध नहीं है, न ही तकनीक शत्रु है, लेकिन जब यह बच्चों और किशोरों के लिए लत बन जाए, तो यह एक धीमा जहर बन जाती है। यह जहर चुपचाप बच्चों के मस्तिष्क में प्रवेश करता है, उनकी सोच, उनकी भावनात्मक संरचना और उनके निर्णय लेने की क्षमता को विकृत करता है। गेमिंग की दुनिया बच्चों को तात्कालिक रोमांच, आभासी जीत और काल्पनिक पहचान देती है, लेकिन धीरे-धीरे वही दुनिया उन्हें वास्तविक जीवन से काट देती है। परिवार, मित्र, पढ़ाई, प्रकृति, खेल और संवाद-सब कुछ पीछे छूटने लगता है। गाजियाबाद की तीनों बहनों का यह कदम इसी कटाव का चरम और भयावह परिणाम है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अत्यधिक ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के मस्तिष्क में आवेग नियंत्रण को कमजोर करती है। जोखिम का आकलन करने की क्षमता घटती है और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ती है। हार, असफलता या गेम से वंचित किए जाने की स्थिति में अवसाद, क्रोध और निराशा गहराने लगती है। कई बार बच्चे आत्महत्या जैसे चरम कदम को भी एक ‘गेम ओवर’ की तरह देखने लगते हैं। यह सोच अपने आप में अत्यंत खतरनाक है। आत्महत्या की प्रवृत्ति का बढ़ना केवल मानसिक स्वास्थ्य का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक चुनौती है, जो हमारी परवरिश, हमारी प्राथमिकताओं और हमारी नीतियों पर सवाल उठाती है।
आज के परिवारों में माता-पिता की व्यस्तता, एकल परिवारों की बढ़ती संख्या और संवाद की कमी ने बच्चों को अकेलेपन की ओर धकेला है। स्मार्टफोन कई घरों में बच्चों की चुप्पी खरीदने का सबसे आसान साधन बन गया है। रोता बच्चा हो, जिद करता बच्चा हो या समय न देने की मजबूरी-मोबाइल फोन एक त्वरित समाधान बन चुका है। लेकिन यही समाधान आगे चलकर सबसे बड़ी समस्या बन जाता है। हम यह भूल जाते हैं कि बच्चा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मार्गदर्शन, स्नेह और समय चाहता है। जब यह सब उसे स्क्रीन से मिलने लगता है, तो परिवार की भूमिका स्वतः कमजोर हो जाती है। यह भी एक कठोर सत्य है कि कई माता-पिता स्वयं डिजिटल लत के शिकार हैं। ऐसे में बच्चों को रोकने का नैतिक और व्यवहारिक अधिकार भी कमजोर पड़ जाता है। हम बच्चों से अपेक्षा करते हैं कि वे मोबाइल कम चलाएं, जबकि हमारे अपने हाथों में हर समय फोन रहता है। यह दोहरा व्यवहार बच्चों के मन में भ्रम और विद्रोह दोनों पैदा करता है। इसलिए समस्या का समाधान केवल बच्चों पर नियंत्रण नहीं, बल्कि पूरे पारिवारिक वातावरण में संतुलन लाने से जुड़ा है।
सरकार और समाज की भूमिका भी इस संकट में कम महत्वपूर्ण नहीं है। ऑनलाइन गेमिंग उद्योग तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन उसके सामाजिक प्रभावों पर पर्याप्त नियंत्रण और निगरानी का अभाव है। कई गेम्स में हिंसा, आक्रामकता और जोखिम भरे व्यवहार को सामान्य और रोमांचक रूप में प्रस्तुत किया जाता है। बच्चों के लिए आयु-उपयुक्त सामग्री, समय-सीमा और चेतावनी संकेतों को सख्ती से लागू करना अब विकल्प नहीं, बल्कि अनिवार्यता बन चुका है। सरकार को चाहिए कि वह ऑनलाइन गेमिंग और डिजिटल कंटेंट के लिए स्पष्ट और कठोर नियामक ढाँचा विकसित करे, जिसमें बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि हो। विद्यालयों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रह सकती। डिजिटल साक्षरता, मानसिक स्वास्थ्य और जीवन-कौशल को शिक्षा का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। बच्चों को यह सिखाना आवश्यक है कि तकनीक का उपयोग कैसे किया जाए, न कि तकनीक के गुलाम कैसे बना जाए। शिक्षकों को भी बच्चों के व्यवहार में होने वाले बदलावों, अकेलेपन, चिड़चिड़ेपन और अचानक गिरते शैक्षणिक प्रदर्शन जैसे संकेतों को गंभीरता से लेना होगा।
मनोवैज्ञानिक सहायता को लेकर समाज में जो झिझक और संकोच है, उसे भी तोड़ना होगा। मानसिक स्वास्थ्य को कमजोरी नहीं, बल्कि स्वास्थ्य का अभिन्न अंग माना जाना चाहिए। यदि किसी बच्चे में अवसाद, अत्यधिक चुप्पी, आक्रामकता या आत्मघाती विचारों के संकेत दिखें, तो समय रहते विशेषज्ञ की मदद लेना अत्यंत आवश्यक है। देर करना कई बार अपूरणीय क्षति में बदल जाता है। निस्संदेह, ये आत्मघात की घटनाएं, ऑनलाइन गतिविधियों के अतिरेक से मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले घातक प्रभाव को लेकर गंभीर सवालों को जन्म देती हैं। निश्चित रूप से आत्मघात की ये घटनाएं हमारे नीति-नियंताओं और अभिभावकों को आसन्न संकट के प्रति सचेत करती हैं। दरअसल,ये दुखद घटनाएं एक घातक प्रवृत्ति को ही उजागर करती हैं कि गेमिंग और डिजिटल संपर्क लाखों युवाओं को आभासी समुदाय और मनोरंजन तो प्रदान कर सकते हैं, लेकिन साथ ही ये भावनात्मक कमजोरियों,सामाजिक अलगाव और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों की पूर्ति न होने जैसी समस्याओं को भी जन्म दे सकते हैं। हालांकि, वहीं दूसरी ओर समाज विज्ञानी इस बात पर भी बल देते हैं कि केवल गेमिंग या ऑनलाइन मित्रता ही आत्महत्या का कारण नहीं बन सकती हैं। निस्संदेह, आत्महत्या एक जटिल और बहुआयामी घटना है। लेकिन समस्याग्रस्त डिजिटल जुड़ाव, विशेष रूप से जब यह ऑफलाइन जीवन से अलगाव, बाधित शिक्षा और तीव्र भावनात्मक तनाव के साथ होता है तो संवेदनशील युवा मन में परेशानी को और बढ़ा सकता है।
गाजियाबाद की यह घटना हमें यह भी सोचने पर मजबूर करती है कि हमने बच्चों के लिए कैसी दुनिया बनाई है। क्या हमने उन्हें संवाद दिया, या केवल उपकरण थमा दिए? क्या हमने उन्हें संस्कार दिए, या केवल सुविधाएं? क्या हमने उन्हें सुनने का समय दिया, या केवल आदेश? यह आत्ममंथन केवल पीड़ित परिवारों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि पूरे समाज को अपने भीतर झांककर देखना होगा। यह घटना एक चेतावनी है, एक टर्निंग पॉइंट है। यदि अब भी हमने इसे एक सामान्य समाचार की तरह भुला दिया, तो भविष्य में ऐसी घटनाएं और बढ़ेंगी। समाज को, सरकार को और प्रत्येक परिवार को मिलकर कड़े और संवेदनशील कदम उठाने होंगे। तकनीक को नकारना समाधान नहीं है, लेकिन उसे बिना नियंत्रण स्वीकार करना भी आत्मघाती है। संतुलन, संवाद और सहभागिता ही बच्चों की सुरक्षा का वास्तविक आधार हैं। गाजियाबाद की तीनों बहनों हो या कूल्लु के किशोर की असमय मृत्यु हमें यह याद दिलाती है कि अगर हमने अभी नहीं संभला, तो यह इलेक्ट्रॉनिक खतरा हमारे घरों, हमारे भविष्य और हमारी संवेदनाओं को निगलता चला जाएगा। यह समय है जागने का, सोचने का और ठोस कदम उठाने का-क्योंकि यह सवाल केवल तकनीक का नहीं, बल्कि जीवन का है।

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