जिन्ना का पाकिस्तान इंटरनेशनल मोनेटरी फंड के सामने नतमस्तक, बेबस जनता खाने को तरस रही है
जिन्ना के सपनों का पाकिस्तान आज अपने सबसे भीषण आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक संकट के दौर से गुजर रहा है, जहां वह इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड के सामने पूरी तरह नतमस्तक दिखाई देता है और उसका तथाकथित आयरन फ्रेंड चीन भी आंखें फेर चुका है, पाकिस्तानी रुपया डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक रूप से गिरकर लगभग 287 के स्तर तक पहुंच गया है, विदेशी मुद्रा भंडार सिमटकर मात्र 3.10 अरब डॉलर रह गया है जो मुश्किल से 15 दिनों के आवश्यक आयात को ही संभाल सकता है, ऐसे में महंगाई, बेरोजगारी और भुखमरी ने पूरे देश में त्राहि-त्राहि मचा दी है, आईएमएफ की शर्तों को मानने की मजबूरी में पाकिस्तान सरकार ने गैस के दामों में लगभग 30 प्रतिशत की बढ़ोतरी की है और बिजली की कीमतों में प्रति यूनिट कई रुपये का इजाफा कर दिया है, जिसका सीधा असर आम जनता पर पड़ा है, पंजाब से लेकर बलूचिस्तान और सिंध तक लोग सड़कों पर उतर आए हैं, विरोध और विद्रोह की आवाजें तेज हो रही हैं, आटा 250 रुपये किलो में भी मुश्किल से मिल रहा है, चावल गायब है और शक्कर आम आदमी के लिए कड़वी सच्चाई बन चुकी है, प्रधानमंत्री नवाज शरीफ द्वारा दिवालियेपन की कगार पर पहुंचने की स्वीकारोक्ति इस बात का प्रमाण है कि पाकिस्तान अब केवल कर्ज लेकर कर्ज चुकाने के दुष्चक्र में फंस चुका है, संयुक्त अरब अमीरात और खाड़ी देशों का सहायता से इनकार करना और चीन द्वारा सीपीईसी परियोजनाओं में कार्यरत अपने नागरिकों की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्वयं उठाने का संकेत देना पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख के पतन को दर्शाता है, आतंकवाद को राज्य नीति का औजार बनाकर जिन्ना के पाकिस्तान ने जो रास्ता चुना था उसी का परिणाम है कि आज वह वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़ गया है, जहां एक ओर भारत 15 अगस्त 1947 के बाद लोकतंत्र, विकास और वैश्विक सहयोग के रास्ते पर चलते हुए विश्व की प्रमुख आर्थिक और सामरिक शक्तियों में शामिल हो चुका है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान आतंकवाद, अस्थिरता और गलत नीतियों के कारण कंगाली और अराजकता की ओर बढ़ गया है, श्रीलंका जैसे हालात की आशंका अब केवल संभावना नहीं बल्कि वास्तविकता के बेहद करीब है, इसके बावजूद कश्मीर को लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राग अलापना पाकिस्तान के राजनीतिक नेतृत्व के मानसिक दिवालियापन को उजागर करता है, आज पाकिस्तान के पास अपनी आवाम को बचाने के लिए न तो संसाधन हैं और न ही विश्व का भरोसा, केवल आईएमएफ की कठोर शर्तें ही उसे कुछ समय की सांस दे सकती हैं, लेकिन यदि उसने आतंकवाद से दूरी, आर्थिक सुधारों और पड़ोसी देशों के साथ व्यवहारिक नीति की ओर आमूलचूल परिवर्तन नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं जब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष भी उससे हाथ खींच लेगा और पाकिस्तान इतिहास में एक असफल राष्ट्र के रूप में दर्ज हो जाएगा।

वेटरन्स डे
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